क्या अर्जुन समझ पाया गीता को?

नहीं! नहीं! अर्जुन नहीं समझ पाया गीता को।.
Written by..वासल देवेन्द्र..D.K. Vasal.

Kindly forward as much as possible.

यदि मैं साबित नां कर पाया,
कि अर्जुन नहीं समझ पाया गीता को।
तो काट देना तुम गर्दन मेरी,
सोच ये नीच कंहा से आया।

यदि कर दिया साबित मैंने,
कि अर्जुन नहीं समझ पाया गीता को।
तो कृपा करके नां देना ज्ञान उसको,
खोया जिसने जवान बेटा उसको।

छोड़ कर अपना धनुष बाण,
बोला फिर अर्जुन कृष्ण से,
मैं नहीं लडूंगा हे गोविंद।

समझाया बहुत तब कृष्ण ने,
छोड़ो अर्जुन तुम ये मोह माया।
ये अपने परायों का बंधन,
नही मरती आत्मा कभी।
जो रहती है सब के अन्दर।

क्या सच में समझ गया अर्जुन?
जो हो गया तैयार फिर लड़ने को।
नहीं मानता वासल देवेन्द्र ये,
करता हूं कोशिश समझाने को।

बोला अर्जुन हे केशव,
मैं नहीं मारना चाहता इन सब को।
ये सब हैं मेरे अपने तो,
कैसे मारूं बोलो अपनों को।

लालच में धरा यां राज्य के,
जो मारेंगे हम इन सब को।
लगेगा पाप हमें केशव,
जो मारेंगे हम अपनों को।

बोले भगवान ओ पापरहित अर्जुन,
तूं सुन ध्यान से मेरे बोलों को।
नही मरती आत्मा कभी,
और नां वो मारती किसी को  कभी।

तूं शोक नां कर व्यर्थ का,
मैं मार चुका हूं पहले ही।
जो खड़े हैं तेरे सामने अब,
हर लूंगा तेरे पाप  मैं सब,
हों पिछले यां तूने करें हो अब।

देख प्रभु का विराट रुप,
हो गया अर्जुन अब शोकरहित।
उठाया लिया फिर गांडीव तब,
और लगा मारने सब को अब।
नहीं रोका भीम को भी,
मारने को कौरव 100 पुत्र सभी।

क्या सच में समझ गया अर्जुन?
जो कहा कृष्ण ने गीता में।
नहीं मानता वासल देवेन्द्र अभी,
आसान है मारना दूसरों को,
हो अधर्म के लिए यां धर्म वंश।

ज़रा सोचो समझो ध्यान से सब,
कहता है वासल देवेन्द्र अब।
नही सोचा होगा तुमने कभी,
गीता और अर्जुन का रंग ये कभी।

सारे ज्ञाता पड़ने वाले यां,
पढ़ाने वाले गीता को।
नहीं समझते यां बतलाते वो,
अर्जुन के इस रूप को।

क्या हुआ था अर्जुन को,
सुन गीता मुख भगवान से,
क्या चला गया था मोह उसका?
क्या मिट गया था भ्रम उसका?

नहीं मानता वासल देवेन्द्र ये,
सभी ज्ञानी, उच्च ज्ञानी,
जानने वाले गीता को।
पढ़ने और पढ़ाने वाले गीता को।

खोल कान, आंख, सुनो देखो,
क्या कहता है ये अधना कवि।

होने पर रचना चक्रव्यूह की,
ले गये  जब दूर अर्जुन को।
फिर घेर सात महारथियों ने,
मारा अर्जुन पुत्र अभिमन्यु को।

ज़रा सोचो समझो ध्यान से सब,
क्या हुआ तब निष्पाप अर्जुन को।
क्या कहा था अर्जुन ने सुन,
मृत्यु पुत्र अभिमन्यु की।

बोला अर्जुन रो रो कर,
होकर पूरा वो शोकग्रस्त।
यदि नहीं मारा मैंने जयद्रथ को,
होने से पहले कल सूर्य अस्त।
ले लूंगा समाधी अग्नि में,
समझ खुद को एक पिता विवश।

अर्जुन मारना चाहता जयद्रथ को,
वो कारण था अभिमन्यु मरने का।
नहीं मारना चाहता था अर्जुन,
किसी धर्म के वश,
पर केवल केवल बदले वश।

कहां ज्ञान गया तब अर्जुन का,
जो सुना था ईश्वर के मुख से।
था पापरहित उच्च आत्मा अर्जुन,
था कहना खुद ईश्वर का।

चुना था कृष्ण ने अर्जुन को,
नहीं चुना गंगा पुत्र भीष्म को।
जो रुप दिखाया अर्जुन को,
नहीं दिखाया रुप वो ब्रम्हा को।

फिर क्यों अर्जुन हुआ विचलित,
सुन ख़बर मृत्यु पुत्र अभिमन्यु की।
हुआ हाल अगर ये अर्जुन का,
सोचो व्यथा शमा ( author’s wife) और
वासल देवेन्द्र की।
खोने परअपना जवान बेटा,
क्या हाल हुआ होगा उनका।

क्यों नही अर्जुन सोच पाया तभी,
नहीं आत्मा है मरती कभी।
नही मरा है अभिमन्यु अभी,
बस देह परिवर्तन हुआ अभी।

खोने से अपना एक पुत्र,
भूल गया ज्ञान जो उसने पाया।
क्या बोला था वो कृष्ण को,
हां मेरा सब भ्रम मिट पाया।
हूं तैयार मैं युद्ध करने को।

मरते ही बस अपना पुत्र,
वो भूल गया ईश्वर रुप को।
कृष्ण मुख से निकले ज्ञान को,
यूं ही नहीं कहता वासल देवेन्द्र,
अर्जुन नही समझ पाया गीता को।

क्या ग़लत है कथन गीता का?
यां अर्जुन नहीं समझ पाया तब।

खुद भगवान नहीं समझा पाये,
उस पिता को था भीतर जो अर्जुन के।
फिर क्या ज्ञानी बनता है समाज,
बिना मिले ऐसे दुखों के।

जब अर्जुन हो सकता है विचलित,
क्या बात साधारण मनुष्य की।
देख रुप भगवान का,
और सुन ज्ञान उनके मुख से।
यदि मोह नही मिटा अर्जुन का,
अपने पुत्र अभिमन्यु से,
क्यों बनते हो बड़े ज्ञानी तुम,
जैसे हो बड़े तुम अर्जुन से।
और देते हो ज्ञान हमें,
जैसे हो बड़े तुम कृष्णा से।

नहीं मानता वासल देवेन्द्र,
कि अर्जुन समझ पाया गीता को।
यदि समझा होता उसने,
कृष्ण ( भगवान) के उस भाव को।
नहीं करता प्रकट इच्छा मरने की,
यां जयद्रथ को मारने की।
नहीं मानता वासल देवेन्द्र,
कि अर्जुन समझ पाया गीता को।
****
Kindly circulate as much as possible.
We need to understand this truth and reality of life.

अधूरी कहानी

अधूरी कहानी . written by वासल देवेन्द्र..D.k.Vasal
अधूरी कहानी

कुदरत को जो करना है,
कुदरत वो करके रहती है।
एक मौज जो नाज़ुक कश्ती को,
तुफ़ान से बचा कर ले आये।
कुदरत ने तमाशा करना हो,
साहिल (किनारा) पे डूबो के रहती है।

हम हंस लें यां रों लें जितना भी,
कुदरत तो बहरी होती है।
लिखा खुद वासल देवेन्द्र ने,
अपनी कविता ख़ामोशी में।
कुदरत निशब्द हो कर भी,
इशारों से बयां करती है।

ख़ुदा नही बताता राज़ अपने,
हम जितना भी हंस लें यां रो लें।
हम कुछ नां करें यां कुछ भी कर लें,
कुदरत तो चलती रहती है।

हां शिकायत यकीनन है उससे,
कहते हैं हम कज़ा (मौत) जिसे।
आना ही था अगर उसको,
तो आती थोड़ा नियम से।
थोड़ी तो रखती हया(शर्म),
आने से पहले किसी घर में।
ले जाती उस बाप को पहले,
आया जो पहले इस जहां में।

मौत भी है कुदरत का हिस्सा,
वहां कहां सुनवाई होती है।
कुदरत ने जो करना हो,
कुदरत वो करके रहती है।

पूछा वासल देवेन्द्र ने,
खुदा कुछ तो राज़ बता अपने।
हकदार हैं हम जानने के,
क्या गलती हमारी थी,
और क्या मजबूरी तेरी थी।

बोला ख़ुदा ओ मेरे अज़ीज़(प्यारे),
नां कोई गलती तेरी थी।
नां मजबूरी मेरी थी,
आंसूओं से स्याही मिट गयी,
रह गई कहानी अधूरी थी।

पूछा मैंने ख़ुदा से,
क्या तू भी रोता है कभी।
भीगी आंखों से बोला ख़ुदा,
जैसे खो के अपना बच्चा।
तूं रोता है अभी,
हर पल खोता हूं मैं बच्चे,
हर पल रहती नम आंख मेरी।

कोई छोड़ आता मां बाप को,
किसे छोड़ जाते मां बाप।
पहले नां रखता था मैं दिल,
और नां रोता था कभी।
तुझ जैसे इन्सानों ने,
रच दी मेरी रचना नयी।
टपकते हुए आंसूओं से मेरे,
फैल गई स्याही मेरी थी।
बस इसीलिए बच्चे की तेरे,
रह गई कहानी अधूरी थी।
****



क्या वक्त भुला देता है ग़म।

क्या वक्त भुला देता है ग़म.. written by..वासल देवेन्द्र
D.k.Vasal.

क्या वक्त भुला देता है गम।

कुछ दिन पहले बोया         ,बीज एक दर्द ने,
अब फैल गई उसकी जड़ें    ,शरीर के हर अंग में।
दर्द दिया हो गैर ने             , तो संभाल लेता है वक्त,
दर्द हो अगर लाडले का      , तो और हवा देता है वक्त।

वक्त भुला देता है गम        ,ये सच नहीं है केवल भ्रम,
ज़हन का चैन भी चाहिए    , सोने के लिए।
बस आंख मूंद लेने से         ,नींद नहीं आती,
पहले आती देख लाडले     ,को हंसी।
अब किसी बात पर            ,नहीं आती,
अब कहां हैं                      ,हम खुद,       
हमें ख़ुदकी                       ,ख़बर नहीं आती

कभी खुद को                    ,कभी जहां को,
कभी ख़ुदा को                   ,दोष देते हैं।
एक दूसरे के                     ,गले लगते हैं,
दर्द  बांटते हैं                    ‌‌  ,और रो लेते हैं।

बांटने से घटता है दर्द        ,ये सच नहीं है केवल भ्रम,
रोते हुए गले लगते हैं        ,और दर्द बढ़ा देते हैं।
आज तक सुना था           ,वासल देवेन्द्र ने,
दीये से दीया             ‌ ‌      ,जल उठता है।
आज वक्त ने                   ,सिखा दिया,
दर्द बांटने से                   ,और बढ़ता है।

कुछ ज़ख्म ऐसे हैं           ,जो हमेंशा हरे रहते हैं,
कुछ झरने ऐसे हैं            ,जो आंखों से बहते रहते हैं।
पत्ते बिछड़ कर पेड़ से     ,कहां हरे रहते हैं,
हम समझते हैं बाद         ,पतझड़ के ,नये पत्ते आते हैं।
पेड़ के दर्द को                ,नहीं समझते,
जिसके बच्चे                  ,बिखर जाते हैं।

औलाद नां हो                ,तो एक दुःख,
नालायक हो          ‌        ,तो सौ दुख,
हो अच्छी और नां रहे     ,तो बस दुख ही दुख।

मूर्ख नहीं है हम            ,जो हम समझते नहीं,
होना है हम बूढ़ों को      ,फिर से जवान अभी।
और  नन्हे अभागे         ,फरिश्तों को
होना है वक्त से            ,पहले बड़ा!
हैं वो इतने             ‌     ,मासूम अभी,
वो जानते भी नहीं        ,नही मिलेगा उन्हें
बाप का                      ,साया कभी।

बहुत आसान है कहना  ,संभालों ख़ुद को,
वो पूछते हैं पता            बाप का,
क्या जवाब दूं               ,मैं उनको।
रुको थोड़ा मेरे              ,लाडले के बच्चो,
ये बूढ़ा जवान               ,हो रहा है अभी।
दो शब्द हरि                 ,इच्छा,
नही काफी                   ,बूढ़े मां-बाप के लिए
वर्ना क्यों मरते              राजा दशरथ
प्रभु राम के लिए।

या खुदा रहम कर         ,मुझे जीना है अभी,
उम्मीद भरी निगाहों से   ,मुझे देखते हैं सभी।
*****





ख़ुदा की करेंसी

WRITTEN BY …वासल देवेन्द्र..D.K.Vasal
         ( ख़ुदा की करेंसी)
आंसू जो आंख से टपका     , वो पानी नही है,
है हकीकत हमारे दर्द की     , कोई कहानी नही है।
आते नहीं आंसू                  , बेवज़ह कभी,
कोई तो है वज़ह                ,जो आंख नम पड़ी।

पूछा किसी ने हमसे           ,क्या गुज़री है घड़ी,
रफ़्तार आंसुओं की           ,तब और थी बढ़ी।
लगता था  ऐसे जैसे          , बरसात की झड़ी,।

लगा कर अपने सीने से      ,कहा मैंने उसकी मां से
रोको इन आंसुओं को        ,हैं कीमती ये बहुत,
ना गिरायो इन्हें ज़मीन पर   ,जल जाये ना जहां कहीं।

कुछ संभल कर                  ,कुछ रुक कर,
उनकी जुबां खुली               , बोली वो सिसकियों में।
मैं कुछ नां कर सकी            , यूं पलक झपकते ही,        
गया बेटा……                     , ख़ुदा के जहां में।

ना पूछो हमसे हमारे          ,दर्द की हकीकत,
रो दोगे तुम यकीनन          ,जान के असलियत।
निभाया साथ उसने          ,पूरी जवानी में,
अब आया अजीब मोड़     , हमारी जिंदगानी में।

चला गया हमें छोड़ कर     , रोते हैं हम सभी,
लगता है निकल जायेगा    ,दम अभी के अभी।
मालूम नही हमको           ,क्या था कसूर हमारा,
थी अटूट मौहब्बत            ,यां मोह का अंधेरा।

कहे उसकी मां को             ,प्यार से ये बोल,
मत करो खर्च आंसू          ,इस नशवर जहां में तुम।
रखो बचा के इनको          ,हैं  ये बहुत अनमोल,
आयेंगे काम तुम्हारे           ,जब मिलोगी खुदा से तुम।

किसी धन दौलत             ,यां शोहरत की,
नहीं अहमियत                ,वहां।        
शाय़द ये                        ,अनमोल मोती,
कर दें कुछ                     ,कमाल वहां।

चलती है वही करेंसी        ,उसके जहां में,
बहती है बनके आंसू        ,जो करुणा के भाव में।
हैं पारर्दशक जो              ,पानी की तरहां,
होती है स्वाद जो            ,सागर की  तरहां।

इतिहास है गवाह            ,इसकी काबिलियत का,
हो कृष्ण का दौड़ना         ,द्रोपदी के लिए।
यां  आंसू देवकी के         ,गुज़रे बच्चों के लिए,
यां नानकी के आंसू         ,भाई नानक के लिए।

कहां समझ पाते हैं हम     ,इस जहां में,
हर आंसू भिगोता है         ,दामन खुदा का।             
उस जहां में।

रोते हुए समझाया           ,पिता वासल देवेन्द्र ने,
अधमरी, बिलखती         ,तड़पती हुई मां को।
नां बहायो तुम आंसू        ,अब गिरीश के लिए,
ये पेशकीमती तोफा        ,रखो खुदा के लिए।
बदल दी जिसने             ,तकदीर हमारी
बस एक                       ,घाव में,
देना उसको बदले में       ,दिये दर्द के लिए।

चलती है वही करेंसी       ,ख़ुदा के जहां में
बहती है बन के आंसू      ,जो करुणा के भाव में

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अक्षर ढाई…2.. दर्द.. Written by वासल देवेन्द्र..D. K.Vasal

अक्षर ढाई—2– दर्द।
हर तरहां के लिखे “अक्षर ढाई” ,
वासल देवेन्द्र ने कविता “अक्षर ढाई “में।
बस “दर्द” ही लिखना भूल गया,
हो नाराज़ वो मुझको डस गया।

है पुत्र भी ढाई अक्षर का,
और पितृ भी ढाई अक्षर का।
कब पुत्र बन गया पितृ मेरा,
मुझे ज़रा पता नही चला।

है गंगा भी ढाई अक्षर की,
और पिंड भी ढाई अक्षर का।
है ज्वाला भी ढाई अक्षर की,
और स्वाहा भी ढाई अक्षर का।

क्या होता है ज्वाला में स्वाहा,
मुझे कभी पता नहीं चला।
होते हैं पाप स्वाहा अपने,
यां होता है मोह स्वाहा अपना।
हो जाता है सब स्वाहा,
जैसे भस्म हो ढाई अक्षर का।

पुत्र छोड़ गया पुत्र अपना,
है पुत्र भी ढाई अक्षर का।
और छोड़ गया कन्या अपनी,
है कन्या भी ढाई अक्षर की।
रोती छोड़ गया पत्नी अपनी,
है पत्नी भी ढाई अक्षर की।

तोड़ गया रिश्ता अपना,
है रिश्ता भी ढाई अक्षर का।
हो गया पूरा जन्म का नष्ट,
है जन्म भी ढाई अक्षर का,
और नष्ट भी ढाई अक्षर का।

मृत्यु तुल्य मिला है कष्ट,
है मृत्यु भी ढाई अक्षर की।
है तुल्य भी ढाई अक्षर का,
और कष्ट भी ढाई अक्षर का।

अश्रु बहते जैसे वर्षा,
हैं अश्रु भी ढाई अक्षर के।
और वर्षा भी ढाई अक्षर की,
था मातृ भक्त बेटा मेरा,
है मातृ भी ढाई अक्षर की,
और भक्त भी ढाई अक्षर का।

है आंख भी ढाई अक्षर की,
और आंसू भी ढाई अक्षर का।
है ज़ख्म भी ढाई अक्षर का
और दर्द भी ढाई अक्षर का।

दर्द हर पहलू से होता है दर्द ,
पढ़ो आगे से यां पीछे से होता है दर्द।
दे दोस्त, दुश्मन यां खुदा,
दर्द हर हाल में होता है दर्द।

इससे अच्छा कोई दोस्त नही,
बेवफ़ाई का इसमें दोष नही।
खुद ही बन जाता है दवा अपनी,
किसी मलहम की इसको तलाश नही।

किसी खंजर से इसको भय नहीं,
सब दोस्त हैं इसके कोई दुश्मन नहीं।
मिलता है सबको कभी नां कभी,
बच सकता इससे कोई नहीं।

आने का इसके कोई वक्त नही,
जाने का इसके कोई वक्त नही।
है गहरा रिश्ता आंखों से,
आंसू रुकने देता नही।

हर तरहां के लिखे ढाई अक्षर,
वासल देवेन्द्र ने कविता ढाई अक्षर में।
बस दर्द ही लिखना भूल गया,
हो नाराज़ मुझे वो डस गया।

तूं दर्द है मेरे लाडले का,
रखूंगा दिल के पास तुझे।
तूं उम्मीद लेकर आया है।
पालूंगा प्यार से मैं तुझे,
तूं भी रखेगा याद मुझे,
कैसा मिला है कृष्ण भक्त तुझे।
***





कृष्ण भक्त और दर्द


कृष्ण भक्त और दर्द.. Written by..वासल देवेन्द्र..
D. K. Vasal
कृष्ण भक्त और दर्द।

भक्ति करने वाले समझ लें,
भक्ति सागर के किनारे नही।
रहें डूबने को हर पल तैयार,
इस राह में कोई सहारे नही।

ये राह है कांटों से भरी,
नही रहती यहां कोई घास हरी।
उम्मीदें रह जाती हैं धरी,
हर घड़ी होती है दर्द भरी।

मिलता है इतना दर्द इसमें,
भूल जाता हैं पाने वाला,
वो दर्द में हैं यां दर्द उसमें।

नही कर्म में रखा ईश्वर अपना,
रखा उसको क्रिया में अपनी।
हर सांस में रहता है मेरी,
जैसे ख़ून चले नस में मेरी।

ये हकीकत है मेरे जीवन की,
नां हैं अतिशयोक्ति किसी पल की।
है ईश्वर ही गवाह मेरा,
रहा हर पल उसके नाम मेरा।

खाना जाए , जल जाए यां कुछ भी जाए भीतर मेरे,
सब होता सदैव अर्पित उसको।
नां सांस आये , नां हवा जाए बिना कृष्ण नाम  भीतर मेरे,
कृष्ण साथी मेरी नींद का और मेरे हर भोज का
दौडूं भागूं कुछ भी करुं कृष्ण साथी मेरी मौज का।

तड़पाता है तूं अपनों को,
ये देख लिया मैंने अब तो।
तड़पाया अपने मां बाप को,
क्या बख्शेगा तूं भक्तों को।

मीरा रोई, कुन्ती रोई,
रोये सुदामा , सूरदास प्रभु।
सीता रोई, कौशल्या रोई ,
रोये दशरथ पिता प्रभु।

अर्जुन रोया, अभिमन्यु खोया,
रोये पांडव, खो पुत्र पांच प्रभु।
राधा रोई , देवकी रोई , रोये पिता वासुदेव प्रभु।
रोये ग्वाल, रोया गोकुल, रोया वृन्दावन प्रभु।
क्या फर्क पड़ता है तुझको,
जो रोये  वासल देवेन्द्र  परिवार प्रभु।

छोड़ूंगा मैं भक्ति नही,
चाहे तू ले ले जान मेरी।
कृष्ण भक्त होते हैं जिद्दी,
शायद तुझे भी पता नहीं।
*****




खुदा का खंजर

खुदा का खंजर।

ख़ुदा का खंजर…. WRITTEN BY ..वासल देवेन्द्र
खुदा का खंजर,
गलती से चल गया उसका खंजर,
रो रहा है ख़ुदा आसमान में बहुत,
देख कर भक्त के घर का मंजर।

खड़ा है दरवाजे पर हो कर शर्मसार,
सुन रहा है चीखें और भक्तों की पुकार।
हिम्मत नही जुटा पाता आने की घर के अन्दर,
वो जानता है सब कुछ जो है इस घर के अन्दर।
बहुत खूबसूरत बनाया है मेरा मंदिर।

हर प्राणी इस घर का रखता है मुझे दिल में,
पहला शब्द पुकारा ” कृष्णा” नन्हे आर्यन ने।
रोती है अनन्या कर याद पिता को अपने,
सोचता है हर पल खुदा अपने मन में।

क्या मुंह दिखाऊं मैं बिलखती पत्नी वन्दना को,
चीर देगी दामन मेरा घायल बहुत है  मां तो।
बच गया बूढ़ा बाप मिलता हूं जा कर उसको
छोड़ दिया जिसे मैंने कर के अर्ध मरा तो।

हर सांस में जो रखता याद हमेशा मुझको
5 साल की उम्र से रटता जो मेरे नाम को
दिन रात बजाता बांसुरी कर कर के याद मुझको
क्या कहेगा वासल देवेन्द्र मैं सोचता हूं अब तो।

भक्त भी हो जाते है शिकार ये मैं जानता हूं,
चल गया खंजर गलती से ये मैं मानता हूं।
हैं वो पक्के ढीठ भक्त  समझते मुझको पावन,
हर सांस में पकड़े रखेंगे वो हर पल मेरा दामन।
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श्मशान वैराग्य… Written by वासल देवेन्द्र…D.K.Vasal


कभी ना कभी होता सब का,
थोड़ा बहुत मन वैराग्य।
कभी कभी शमशान जो जाओ,
होता है शमशान वैराग्य।

मन सब का होता उश्चाट,
थोड़ा बहुत शमशान में जा के।
गुलमिल जाते वापस आकर,
फिर अपने संसार में आके।

हां गुलना मिलना भी है जरूरी,
हैं जब तक बची हमारी सांसें।
पर मत भूलो महसूस करना,
लगा था जो शमशान में जा के।

भागो चाहे  छिप जाओ जितना,
मत भूलो है रूह की आदत।
जैसे तैसे करके भी,
है पाना उसको बस वैराग्य।

है सुख दुख का कारण ये रुह,
जो रहती बंधी हर दम इस देह में।
प्रकृति है उसकी आज़ाद,
दम घुटता उसका इस देह में।
जैसे तैसे करके भी,
है पाना उसको वैराग्य।

आदत डालो धीरे धीरे,
पहले समझो तुम वैराग्य।
करो मोह को भी तुम थोड़ा।
लालच भी छोड़ो धीरे धीरे।

वैराग्य नहीं रहना जंगल में,
यां छोड़ना ये संसार।
रहते हुए भीड़ में भी,
कर लो मन अपना एकांत।

विज्ञान कहता है सोचता मन,
एक पल में बस एक विचार।
है वासल देवेन्द्र बस दोहराता,
चलो सोचें हर पल हरि नाम,
हो जायेगा मन एकांत।

हरि के नाम में लगा मनुष्य,
भीड़ में भी रहता एकांत।
होकर कर वो संसार में भी,
होता है वैरागी ही।
*****





GREY FAITH

Written by वासल देवेन्द्र….D.K.Vasal
GREY FAITH

PRAYER TO THE LORD,
WITH SUBTLE AND DOUBTED WILL,
WITH INCENSE STICK IN HAND,
AS IF A PIOUS FRILL,
BELIEVE YOU ME OR NOT,
IS NOTHING BUT A DRILL.

UNSHAKEN FAITH IN LORD,
IS NOT A SIMPLE THOUGHT,
IN FAITH NO ONE WAILS,
AND STANDS LIKE A ROCK,
THAT KIND OF FAITH,
DARES TO MOVE’ MOUNTAINS.

FAITH MOVES MOUNTAINS,
NARRATED FROM STONE AGE,
BUT OUR FAITH IS SUCH,
THAT LIMPS AT EVERY STAGE.

WE MOVE ONE STEP FORWARD,
AND TAKE TWO STEPS BACK,
THAT MAKES IT CRYSTAL CLEAR,
HOW IN FAITH ALL WE LACK,
LIKE NEEDLE OF THE CLOCK,
THAT PROGRESSES TO TWELVE,
AND COMES TO ONE BACK.

OUR FAITH IS LIKE AN ICE-CREAM,
THAT SURVIVES IN COLD BELTS,
WITH LITTLE AMOUNT OF HEAT,
IT’S WHOLE STRUCTURE MELTS.

FAITH IS NOT THAT SHAKES,
MILLIONS CLAIMING FAITH,
OSCILLATE IN WEAK MESH,
THOSE WITH UNSHAKEN FAITH
ARE MADE OF DIFFERENT FLESH.

EASY SAID THAN DONE,
IS STORY OF OUR FAITH,
VASAL DEVENDER WONDERS,
IF WE UNDERSTAND,
THE REAL ELEMENT OF FAITH.

A SHALLOW DEPTH OF PRAYER,
AND GREY TINGE OF FAITH,
I WONDER ONCE AGAIN
IF THAT CAN MOVE MOUNTAINS.

MAY BE MY PRAYER FOR NOW,
NOT TOUCHING LORD’S HEART,
BUT I FEEL BLESSED,
IF IT REACHES HIS EARS.

HE CAN NOT TURN ME AWAY,
FOR QUALITY OF MY PRAYER,
FROM HEART I ALWAYS BOW,
WITH EVERY WORD I UTTER.

A SON CAN BE AN IDIOT,
BUT FATHER IS FULL OF GRACE,
I PRAY, SHOUT AND CRY,
MY LORD FOR YOUR GRACE.
*****

मारेंगे सुई चुभा चुभा के

WRITTEN BY D K VASAL.. वासल देवेन्द्र।
मारेंगे सुई चुभा चुभा के

ये दुनिया अजीब सराये ( INN )
फानी ( which has certain end) देखी,
हर चीज़ यहां की
आनी जानी देखी,
जो जा कर नां आये
वो जवानी देखी दे
जो आ कर नां जाये
वो बुढ़ापा देखा।
पर ये अजीब दौर अब देखा
जिसमें हर पल ने हमको
और हमने हर पल को
शक की निगाह से देखा।
वो कब किस का बन जाये मेहमान
कोई नही जानता
ये पहला है मेहमान
जिसे कोई नही चाहता
है ये बहुत बेशर्म
शर्म नही करता
बच्चा हो यां बूढ़ा
फर्क नही करता
ले लेता हैं सबको अपनी चपेट में
रहम नही करता।
है पूरी दुनिया से इसको बैर
नां इसका कोई अपना नां कोई गैर
है अधर्मी ये बड़ा
कोई धर्म नही मानता
है नियम इसके अपने
कोई नियम नही मानता
है नही ये जवानी की तरह
जो जाकर नही आता
यां बुढ़ापे की तरह
जो आकर नही जाता
हां ये आज है एक पहेली
पर उलझ गया गलत जगह
ये इन्सान को नहीं जानता
इन्सान है नाम उस “श” का
जो कभी हार नही मानता
हर किसी को वो
तलवार से नही मारता
तुझ जैसे नीच को
तो सुई चुभा चुभा के मारता
वासल देवेन्द्र ने छीन ली तेरी पहचान
कहा तुझे एक पहेली
नही दिया तुझको कोई नाम
ओ बेशर्म अपनी औकात
और इन्सान की ताकत को पहचान
अब भाग जा तूं बचा कर
अपनी जान।
*****

बोली की होली

बोली की होली।
WRITTEN BY D.K.VASAL..वासल देवेन्द्र।
बोली की होली

आओ खेलें हम सब होली,
इस बार खेलें, बोली की होली।
होली है रंगों की टोली,
हों जहां रंग होती वहां होली।
चलो खेलें बोली की होली,
थोड़ा हटकर खेलें इस बार की होली।

हम ध्यान नहीं करते पर दिन भर,
हम हर दम खेलते रहते होली।
गुस्से में चेहरा हो लाल पीला,
मुस्कुराने से होता मौसम रंगीला।
शरमाओ तो हों गाल गुलाबी,
बदल देती है चेहरे के रंग,
हम सब की ये अपनी बोली।

बोलें अगर हम मीठी बोली,
छोड़ेगी वो रंग सतरंगी।
हर पल होगी हमारी होली,
कुदरत के रंगों की होली,
खेली जो गालों ने होली।

नही होता रंग सफेद होली में,
हो चेहरा सफेद बस घबराहट में।
नां बोलो तुम कभी ऐसी बोली,
जो करे सफेद चेहरे की होली।

खेलो मीठे वचनों की होली,
रंग दो सब का तन मन ऐसे।
कुदरत ने बांटे रंग जैसे,
जैसे हो फूलों की क्यारी।

शब्दों की चाशनी से भरे गुब्बारे,
आज नां छोड़ो किसी को भी तुम।
बिना गिनें मारो गुब्बारे,
मारने वाला नां शरमाये,
खाने वाला मस्त हो जाये।

रसना (ज़ुबान /जीवा ) अपनी को मीठी बनायो,
मीठी वाणी की पिचकारी चलाओ।
रंग बिरंगे रंग बरसाओ,
मीठे शब्दों के बान चलायो,
खुद खाओ औरों को खिलायो।

आओ मिलजुल खेलें होली,
हट कर थोड़ा खेलें होली,
आज खेलें बोली की होली।

है वासल देवेन्द्र का कहना,
होली तो है एक बहाना।
है हमको रूठों को मनाना,
कौन रूठता है गैरों से?
तुम रूठे जो हमें अपना माना।

चलो रखें हम मान होली का,
तुम अब कर दो माफ़ मुझको।
मैं भी भूल जाऊं हर शिकवा,
इस बार खेलें ये मौखिक होली।
रंगों में भीगे शब्दों की होली,
आओ खेलें बोली की होली।
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हमारी प्यारी अनन्या।

WRITTEN BY D.K.VASAL…वासल देवेन्द्र।
My granddaughter ANANYA’S birthday today.
हमारी प्यारी अनन्या।

अनन्या नहीं कोई आम कन्या,
है अदभुत बहुत हमारी अनन्या।
अनन्या का मतलब है अनंत,
है सचमुच में अनन्त अनन्या ‌।

पड़ने लिखने में श्रेष्ठ अनन्या,
खेल कूद में तेज अनन्या।
चित्रकारी में निपुण अनन्या,
जो हम सब की है प्यारी अनन्या।

मम्मी पापा की परी अनन्या,
आर्यन की प्यारी दीदी अनन्या।
दादी की सहेली अनन्या,
और दादु का है घमंड अनन्या।

घर हमारे की जान अनन्या,
सयानी बड़ी हमारी अनन्या।
रुठ जाती है जब अनन्या,
मनाता हर कोई कह मेरी अनन्या।

छुप जाये कर शरारत जो,
हर कोई ढूंढे है कहां अनन्या।
कोने में वो बैठी छुप कर,
मिले पड़ती ” हैरी पॉटर” अनन्या।

आज हो गई ‌गयारह बरस की अनन्या,
जैसे जादू से बड़ गई अनन्या।
कल तक थी जो खेलती गोद में,
अब भाई को गोद उठाये अनन्या।

तुम सुनो मज़े की बात अनन्या,
बतलाता है दादु वासल देवेन्द्र।
अब हर कोई करता घर में दावा,
बस उसने दिया तुम्हें नाम अनन्या।

अब तुम समझी प्यारी अनन्या,
क्या होता है होना अनन्या।
लाखों और हजारों जन्में,
फिर जन्मी हमारी जान अनन्या।

मम्मी पापा की प्यारी अनन्या,
भाई आर्यन की दुलारी अनन्या।
दादी दादू का है ये कहना,
हर सांस में देंगे तुझे दुआएं,
है जब तक सांस में सांस अनन्या।

दादी दादु हैं उनके आभारी,
दी जिन्होंने हमें प्यारी अनन्या।
है हर पल दुआ हम दोनों की,
खुश रहें तेरे मम्मी पापा अनन्या।

अब ध्यान से सुन तूं प्यारी अनन्या,
ये दादी दादु की शिक्षा अनन्या।
तूं रहना हरि के नाम अनन्या,
नही उससे बड़ा कोई मित्र अनन्या।
बिना हरि नही कोई अनन्या।
है लाखों में एक हमारी अनन्या,
नही कन्या कोई जैसी अनन्या।
****

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कन्या की दुश्मन कन्या ।

Written by D.K.Vasal…..वासल देवेन्द्र।

कन्या की दुश्मन कन्या,
है वो घर धन्या ,जहां होती कन्या,
द्रोपदी से जानों द्रुपद को।
और जनक को जानकी से,
विवेक बड़े अहंकार घटे,
हो जिस घर में भी कन्या।

कन्या ने जनमा मर्द को,
और मर्द भी हो गया धन्य।
मां मिल गई जैसे ईश्वर,
है मां भी उसकी कन्या।

हैं सृष्टि के कुछ रंग,
जो अधूरे बिना कन्या।
ममता, मोह और प्यार का,
है दूसरा नाम कन्या।

मनुष्य हो यां कोई प्राणी,
हो जीव जंतु यां अन्य।
नही होंगी पैदा संतानें,
अगर ना रही कोई कन्या।

हां एक अचंभा है जहां में,
सोचूं जो ध्यान लगा के।
हर औरत को चाहिए बालक,
ना मांगे कन्या दुआ में।

हां समाज की है कुछ गलती,
मानता है वासल देवेन्द्र।
पर विचार कर के जो सोचो,
कन्या की दुश्मन कन्या।

कहां से लाओगे बहू,
ना होगी अगर कोई कन्या।
पर अपनी बहू ना जन्मे,
कभी भी कोई कन्या।

मां अपनी चाहिए सब को,
पर नही चाहिए कोई कन्या।
चेहरे पे आती लकीरें,
जन्में जो घर में कन्या।

है लिखा मार्कन्डेय पुराण में,
है प्रकृति भी एक कन्या।
अहंकार में भूल जाते,
भगवान की मां भी कन्या।

सहती जो सबसे ज़्यादा,
वो पृथ्वी भी है कन्या।
विवेक बड़े अहंकार घटे,
हो जिस घर में भी कन्या।
है वो घर धन्या जहां होती कन्या।
****”
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WOMENS’ DAY, Men are mean I would say,

WOMEN S’ DAY ( DEDICATED TO ALL WOMEN)

WOMENS’ DAY (DEDICATED TO ALL WOMEN) Written by D.k.Vasal..
वासल देवेन्द्र।
Men are mean I would say,
They celebrate a WOMENS’ DAY.
Where is a day ? when woman is away,
Every day is a WOMENS’ DAY.

A man may live a long long life,
He is zero without mother or wife.
He will remain an immature boy,
You are immature, if you ask why?

A man gets life,
Because of his mother.
His house becomes home,
Because of his wife.

You may agree or like to disagree,
Woman is a light in man’s dark life.
With Womens’ prayers men touch heights,
No one loves you as mother and wife.

Tell me ‘O’ man tell me please,
With whom can you have so many fights.
Ready are they to die for us,
Unless we eat they don’t take a bite.

Do you know why?
Woman is called a Woman.
I will tell you the secret behind this,
W IS WHO, O IS OWN.
WOMAN IS ONE WHO OWNS MAN,
IT SOUNDS LOGICAL, when I define.
AS there COULD BE NO MAN
WITHOUT A WOMAN.

Was not Vasal Devender right?
Calling men mean,
Celebrating WOMENS’ day after a year.
As if dear woman,
Is not that dear.( Precious)
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अगर पलकें मेरी कम पड़ी

Written by D. K. Vasal …वासल देवेन्द्र।
अगर पलकें मेरी कम पड़ी,

अजीब होते हैं ,दिल के रिश्ते भी,
कभी बच जाते हैं ,कांटों पर।
कभी छिल जाते हैं ,मखमल पर
जुड़ जाते हैं पल में ,और बिखर जाते भी।

रहते हैं जिंदा ,मुलायम शब्दों पर,
सजाना पड़ता है , नाज़ुक पलकों पर।
मर जाते हैं जो ,फिसले ज़ुबान भी,
नही होते फिर जिंदा ,देने पर जान भी।

सब को खुश रखना ,मुझे नहीं आता,
जलाता हूं चिराग तो , है अंधेरा रुठ जाता।
सूरज को चाहूं तो ,है चांद रुठ जाता,
खुद को जो चाहूं तो है जहां रुठ जाता।

हूं अकेली मैं जान ,रिश्तों के दरम्यान,
किसको भूल जाऊं ,और किसका रखूं मान।
है हर कोई समझता ,है उसकी बड़ी शान,
मुझ गरीब का ,किसी को नहीं है ध्यान।

एक को मनाऊं तो ,है दूसरा रुठ जाता,
कभी कोई रुठ जाता ,कभी कोई रुठ जाता।
सब को खुश रखना ,मुझे नहीं आता,
सच कहूं मुझे रुठों को ,मनाना नहीं आता।

बात है दिल की और ,दिल के रिश्तों की,
बस देख कर ये ,अदा उनकी।
है सोचता वासल देवेन्द्र ,अभी,
सजा लूंगा हर रिश्ता ,दिल में मैं।
अगर पलकें मेरी ,कम पड़ी,
अजीब होते हैं ,दिल के रिश्ते भी,
जुड़ जाते हैं पल में ,और बिखर जाते भी।

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धीरे धीरे

Written by D.K.Vasal….वासल देवेन्द्र
धीरे धीरे
है सृष्टि का संदेश चलो तुम धीरे धीरे,
चलती है धरती भी धीरे धीरे।
ढलता है सूरज भी धीरे धीरे,
टिमटिमाते हैं तारे भी धीरे धीरे।
होती है भोर भी धीरे धीरे।

धड़कता है दिल भी धीरे धीरे,
चलती हैं सांसें भी धीरे धीरे।
फिसलता है बचपन भी धीरे धीरे,
ढलती है जवानी भी धीरे धीरे,
घटती है उम्र भी धीरे धीरे।

प्यार भी होता है धीरे धीरे,
बहलता है मन भी धीरे-धीरे।
पलकें भी झपकती हैं धीरे धीरे,
बालक सोता है धीरे धीरे,
मां सुनाती है लोरी भी धीरे धीरे।

बदलती हैं ऋतुयें भी धीरे धीरे,
खिलते हैं पुष्प भी धीरे धीरे।
महकते हैं गुलशन भी धीरे धीरे,
पकते हैं फल भी धीरे-धीरे।
पचता है भोजन भी धीरे धीरे

चलता है वक्त भी धीरे धीरे,
आती है समझ भी धीरे धीरे।
कहता है वासल देवेन्द्र ये धीरे धीरे,
जप ले हरि नाम तूं धीरे धीरे।
वो सुनता है पुकार को धीरे धीरे,
मिलता है मोक्ष भी धीरे धीरे,
है सृष्टि का संदेश चलो तुम धीरे धीरे।

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CARING SONS

Written by D K Vasal…वासल देवेन्द्र
DEDICATED TO CARING SONS.

Each case has two certain sides,
One is wrong and other is right,
People are good and people are bad
This is true in every walk of life.

Some give balm and some give pain,
Talk is more for crazy Dons,
Let us talk more about worthy sons .
We are responsible for not paying heed,
Bad becomes popular ,good gets eclipsed.

A lot of noise about senior citizen homes,
Bad sons are cursed in every single home,
Why remember always some bad scars,
Don’t close your eyes, to sons who are stars.
Vasal Devender appeals to each & all,
Shower our blessings to all those
SHARAVAN KUMARS.
Just forget all who are bad scars,
Glorify sons who are super stars.

History has given us one Sharavan Kumar,
These bright sons are,
eternal Sharavan kumars.
Forget and forgive all bad scars,
Glorify, Glorify, all noble stars.
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हिंसा

हिंसा
Written by D. k. Vasal- वासल देवेन्द्र
हिंसा
हैं हिंसा करने के ,कई ढंग,
हिंसा नही ,बस तोड़ना अंग।
है हिंसा करना ,शान्ति भी भंग,

इच्छा ना हो ,पूरी जब,
हिंसा करता ,हर कोई तब।
रोना चिल्लाना ,मचाना शोर,
पाने को वस्तु ,यां प्यार,
ये सब हिंसा के ,हथियार।

शब्दों की है ,हिंसा गहरी,
क्या हिंसा ,करे तलवार।
बिना अंकुश के ,बोले शब्द,
छीन लेते हैं ,प्यारे यार।

अंग टूटे नही ,होता उतना,
मन टूटे होता ,जो दर्द।
ना जाने फिर ,शब्द कोश क्यों,
नही कहता इसे ,हिंसा का शब्द।

सब की है ,परिभाषा अपनी,
वासल देवेन्द्र की ,भाषा अपनी।
हैं समाज के ,सुन्दर रंग,
है रहना जो ,सब के संग,
रहो बन के ,एक दूजे का अंग,
और ना करो , तुम शांति भंग।
जब समझोगे ,हिंसा के ढ़ंग,
रंग जाओगे ,अहिंसा के रंग।
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मैं और मेरी “मैं”

Written by D.K. Vasal..वासल देवेन्द्र।
मैं और मेरी “मैं”
तुम तराशोगे ,अगर मुझमें,
हैं तराशते ,हीरा जैसे।
आयेंगी नज़र ,तुम्हें खूबी ही मुझमें,
तुम तलाशोगे ,अगर मुझमें,
हैं तलाशते ,ख़ामी जैसे,
आयेगी नज़र ,तुम्हें कमी ही मुझमें।

मैं क्या हूं ,कुछ भी नहींं,
तुम तराशो मुझे ,यां तलाशो मुझे।
हूं मैं कुछ ,भी नहीं,
बस नज़रिया ,तुम्हारी नज़र का।

ना अच्छी है ,मेरी “मैं”
ना अच्छी ,तुम्हारी “मैं”
है अंत करीब ,उसका,
जिसने भी ,करी है “मैं”

करती मैं मैं ,दिन-रात बकरियां,
हैं कटती ,दिन-रात बकरियां।
कभी सोचा ,कैसे मरता मेंढ़क,
करता टैं टैं ,बताने को हूं “मैं”।
सुन आवाज़ ,आता है सांप,
निगल जाता ,मेंढ़क की “मैं”।

मैं कुछ नही ,तो खुदा हूं मैं,
मैं जिंदा भी ,रहूंगा मरा,
हैं जब तक ,मुझमें मेरी “मैं”।

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प्रारब्ध यां दो हाथ।

प्रारब्ध यां दो हाथ

Written by D.K.Vasal-वासल देवेन्द्र

प्रारब्ध यां दो हाथ
वक्त ने दिया जो साथ हमेशां,
ना आयेगा कोई तज़ुर्बा हाथ।
ज़रुरत पड़ी अचानक जब,
रह जाओगे मलते हाथ।

हैं लकीरें किस्मत की सबके हाथ,
है संवारना उनको अपने हाथ।
है मेहनत करना अपने हाथ,
नां रहो बैठे रख हाथ पर हाथ।

छोड़ा अगर किस्मत ने साथ,
तज़ुर्बा तुम्हारा देगा साथ।
हैं किस्मत के भी पहलू दो,
एक वक्त हमारा – एक हाथ ये दो।

है किस्मत हमेशां एक पहेली,
पर हैं काबू में हाथ ये दो।
हैं बदल सकते ये वक्त तुम्हारा,
तुम किस्मत अपने हाथों में दो।

है छीन सकता वक्त तुमसे,
जो मिला किस्मत के साथ
कर्म खड़ा है सामने उसके,
करने को फिर दो दो हाथ।

सिखाता है हमें कर्म हमेशां,
है किस्मत हमारी अपने हाथ।
कहता है वासल देवेन्द्र ये बात,
ना रहो बैठे रख हाथ पर हाथ।

सूरज करता मेहनत दिन रात,
देने को हमें दिन और रात।
रोज़ होती चंदा की मुंह दिखाई,
हों दोनों जैसे सृष्टि के हाथ।

नही रुकती धरती मां हमारी,
हैं चलती रहती दिन और रात।
देने को सूरज चंदा का साथ,
ले एक दूजे का हाथ में हाथ।

हैं मेहनत करते सब साथ साथ,
रहते ख़ामोश नही करते बात।
सह कर, चल कर, जला कर खुद को,
हैं सिखाते हमको ये बात,

तुम बना सकते हो प्रारब्ध अपनी,
ना रहो बैठे रख हाथ पर हाथ।
तजुर्बा भी आयेगा हाथ,
तुम करो वक्त से दो दो हाथ।
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MIGRANT POOR SOULS

WRITTEN BY D K VASAL—वासल देवेन्द्र
DEDICATED TO MIGRANT POOR SOULS.
They walked, walked, walked and walked.
The life seemed short, the road seemed long.
I saw them fighting every inch.
Beating distance, fighting thirst ,
putting hunger to clinch.
The old one tired, the young one thirsty, the little one hungry.
The sun was tired and set for all.
For them- the day was long , the night did not fall.
Now I wonder what you are.
Cruel to poor and kind to all.
Where were those twinkle twinkle little stars,
The moon looked shark and dark were stars.
I fail to understand how GOD is wise.
Vasal Devender dares to challenge , don’t please lie,
All round money , they don’t have a pie.
May be late but now I realize,
Sun has two colours black and white,
So is moon- gives rich a light and poor a bite
Let me know how God is wise
Watching them all , we sympathise.
If you are a GOD and ready to hear,
Help them, help them, wipe off their tears,
I bow, I bow , again and again,
Help them, help them , before their tears become rain.
I pray I pray I pray again,
Ok, I believe that you are a GOD,
Let my prayers, not go in vain.
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रिश्तों का सच

WRITTEN BY D K VASAL–वासल देवेन्द्र
रिश्तों का सच

मैं सच कहता हूं,
हमेशां सच कहता हूं।
नहीं बोलता झूठ कभी,
हैं हर पल कहते हम सभी।

थामा मैंने जो एक बार,
नही छोड़ूंगा फिर वो हाथ।
मैं जीता हूं अपनों के लिए,
मरुंगा मैं अपनों के साथ।

थरथरा गया अब तो झूठ,
सच हो गया बिल्कुल स्तब्ध।
सुन कर ये हम सब के शब्द,
हां सुनकर ये हम सब के शब्द।

है सूरज की रोशनी सच,
है चांद की चांदनी सच।
धरती की सहनशीलता सच,
आकाश का अनन्त सच।
रात का अंधेरा सच,
दिन का फिर निकलना सच।
नही गवाह बड़ा कोई इनसे,
हैं सबसे बड़े गवाह ये सच,
है वासल देवेन्द्र का लिखा ये सच।

कब देखा इन सब ने किसी को,
मरते किसी को अपनों के साथ।
हां, था एक युग जब सती जली,
कहां पूछी थी मर्ज़ी उसकी।
मजबूत थे बहुत क्रूरता के हाथ,
कहां चाहती थी जलना वो भी,
यां मरना किसी के साथ।

है माया रची भगवान ने सच,
एक माया रची हम सब ने खुद।
कहां जान पाता है कोई,
हम सब के भीतर का सच।

हैं कहते हर रिश्ता अनमोल,
चतुराई से लेते हम तोल।
राम का नाम भी तोला हमने,
है सत्य राम, है सत्य राम।
दबी ज़ुबान में बोला हमने,
होने पर मृत्यु ही बोला हमने।

होती है हैरानी मुझको,
सोच कर वो सब शब्द।
थरथराया था झूठ जिससे,
और सच हुआ था स्तब्ध।

है बात नही बस बोल की,
है बात पूरे ही ढोंग की,
हम जोड़ते रहते हैं टूटे रिश्ते,
है ज़रुरत हर पल गोंद की।

गुज़रता नही है वक्त ज़्यादा,
हम भूल जाते हैं अपनों को।
साथ मरने की बात छोड़ो,
कहां करते याद हम अपनों को।

हैं जरूरत के रिश्ते सब,
नही मरता कोई किसी के संग।
तुम कुछ कर दो मेरा काम।
मैं कुछ कर दूं तुम्हारा काम,
चलो मिलकर हम सब देदें,
इन रिश्तों को कुछ तो नाम।

***

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SOLDIERS –सैनिक

WRITTEN BY D K VASAL,
DEDICATED TO SOLDIERS.
SOLDIERS– सैनिक

वो सो गये कफ़न ओढ़ के,
हम सो गए मुंह मोड़ के,
थे लाडले वो भी, अपने परिवार के,
जो चले गये, सब छोड़ के।

वो बन बन के शव , हमें झंझोड़ते रहे,
हम शव हों जैसे, ऐसे सोते रहे।
देख सुबह अखबारों में, शहादत उनकी,
ले ले कर चुस्कियां, चाय पीते रहे।

पल दो पल में उनको भुलाते रहे,
अपने हर फर्ज़ को हम झुठलाते रहे।
उनकी शहादत को फर्ज़ बतलाते रहे,
उनके बलिदान को, इक खबर बनाते रहे।

ना मिट्टी को अपनी सराहा कभी,
ना वीरौं को अपने दुलारा कभी।
फुला करके सीना, झूठ कहते रहे,
है वतन ये हमारा, चिल्लाते रहे।

हर पल हम रंग बदलते रहे,
गिरगिट भी हमसे शर्माते रहे।
हम सुरक्षा से अपनी, धबराते रहे,
वो सीने पे गोली , खाते रहे।

वो शवों के ढेर, बनते गये,
हम ऊंचा घरों को, करते गये।
परिवार उनके सिसकियां भरते गये,
हम ठहाकों में, सब कुछ भुलाते गये।

क्या आती नही हमको लज्जा शर्म ???
अगर हां , तो वासल देवेन्द्र के संग।

मिलकर हम सब खाते हैं कसम,
मनाने से पहले, कोई भी त्योहार,
करेंगे नमन, उन शहीदों को हम।

है सबसे बड़ा, ये ही शगुन,
हो जाये आंख , हमारी भी नम।
इतना तो कर लें कम से कम,
पत्थर नहीं इन्सान है हम।
*****”

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बांसुरी

बांसुरी
WRITTEN BY D. K. VASAL
( बांसुरी )
इक टुकड़ा है बांस का,
हैं बस छेद ही छेद।
कहां समझ पाया कोई,
हर छेद में कितने भेद।

“स” लगाओ कहीं से,
कहीं से लगाओ “प”।
यकीनन राग बजेगा,
करो ना कोई संदेह।

इक टुकड़ा था बांस का,
था ना कोई नाम।
हरि ने उठाया हाथ में,
बांस हुआ हैरान।

करे छेद कुछ हरि ने,
दे दिया बांसुरी नाम।
हर सुर निकले हर छेद से,
दे दिया ये वरदान।

लगाया हरि ने जब होंठों से,
मां सरस्वती को हुआ ज्ञान।
आकर बैठी हर सुर में,
टूटा सब का ध्यान।

ॠषि , मुनि और हर ज्ञानी,
मनुष्य पक्षी और हर प्राणी।
सुनें सांस को रोक सब,
बांसुरी बोले हरि की बानी।

देख बांस की कहानी,
भर आया आंख में पानी।
सोचा वासल देवेन्द्र ने,
ये देह तो है आनी जानी।
बनाता अगर मुझे बांस तो,
क्या होती हरि की हानी।

लगता हरि के होंठों से
गाता हरि की बानी।
मैं मनुष्य होकर भी कुछ नही।
वो बांस होकर भी सब कुछ है

शायद इसी का नाम प्रारब्ध है
शायद यही हरि की इच्छा है।
है लीला ये सब हरि की
ये हरि की ही सब इच्छा है।

फिर आया विचार मेरे मन में,

हरि तो हैं कृष्ण भगवान,
बनाया नही मुझको बांस।
कुछ सोच बनाया मुझे इन्सान,
भेजा देकर बस ये ज्ञान।
लो हर सांस में उनका नाम,
है हरि से बड़ा हरि का नाम।
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मोक्ष

WRITTEN BY D. K. VASAL — वासल देवेन्द्र ( मोक्ष )
कहा किसी ने मुझसे,
कहो कवि कुछ ऐसा।
हो बात कल्याण की,
हो संदर्भ मोक्ष का।
अहो भाग्य मेरे,
नाम आया याद ,
फिर हरि का।

है मोक्ष नही ये प्रश्न सरल,
लगता है समय बतलाने में।
भगवान को भी लगा समय,
अर्जुन को समझाने में।

मैं हूं एक अदना सा कवि,
क्या लिखे मोक्ष पे ,कलम मेरी।
लिख पाऊं अगर दो शब्द भी,
होगी हरी की कृपा बड़ी।

आया जब तक ना समझ,
अर्जुन की व्याकुलता बड़ी।
है मोक्ष नही प्रश्न केवल,
है अदभुत रहस्य जीवन का।
गीता में ही है छिपा,
भेद इसके मिलने का।

“मो” से मोह, “क्ष” से नाश,
हो नाश मोह का,है अर्थ इसका।
बस इतना समझना है हमको,
हो कैसे नाश ,अब इस मोह का।
है यही सार बस यही सार,
है मोक्ष सार बस गीता का।

गीता नही कोई धर्म ग्रन्थ,
है उत्तम तरीका जीने का।
नही आता शब्द गीता में,
एक बार भी हिन्दू होने का।

करो ज्ञान योग यां, कर्म योग,
करो भक्ति योग, यां ध्यान योग।
तुम त्यागो ,सब का फल ओर भोग,
खुल जायेगा द्वार मोक्ष का।
है यही एक संदेश मात्र,
एक मात्र तरीका जीने का।

जब रूकेगा आत्मा का आवागमन,
तब होगा परमात्मा से मिलन।
हो जायेंगे एक दोनों हम,
मिट जायेगा तब, सारा भ्रम।

नही भटकेगी फिर आत्मा,
हो कर इतनी अधीर।
थम जायेगा सिलसिला,
मिलने का नया शरीर।

समझाता है ये योगशास्त्र ( गीता),
दोहराता है वासल देवेन्द्र।
ले लो अब ये सीख।
छोड़ा अगर परमात्मा,
तुमने जो एक बार।
मिलेगा तुम को गर्भ नया,
रह रह के बार बार।

छुटेगा फिर ना मोह तुम्हारा,
ना होगा मोह का नाश।
ना हरि मिलेगा फिर तुम्हें,
ना फिर मिलेगा मोक्ष।

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मां का कन्धा

Written by D K Vasal – वासल देवेन्द्र
( मां का कंधा )
आज बहुत याद ,आ रही है,
मुझे मेरी मां की।
यूं तो हरा भरा ,भरपूर है मेरा घर,
सिर्फ बच्चे ही नही ,हैं बच्चों के बच्चे भी मेरे घर।

नां जाने फिर ,भी क्यों,
लगता है मन ,खाली खाली सा।
बहुत खोजा ,हर रिश्ता खोदा,
पर ना मिला कोई ,मेरी माई सा।
कह नहीं सकता ,पर लगता है,
वासल देवेन्द्र को।
लगता होगा ऐसा ही ,हर किसी को।

सोचता हूं कभी ,कह दूं खुदा से,
रहे ना रहे कोई ,तेरे जहां में,
पर है रहना ज़रूरी ,हर मां का।

जब बच्चा था ,लगे चोट,
तो जा पकड़ता था ,मां का कंधा।
हुआ बड़ा ,दर्द बढ़ा,
तो भी था ,मां का कंधा,

अब परिवार में ,ढूंढता है,
हर कोई ,कोई न कोई कंधा।
और आ कर ,पकड़ता है,
मुझ खुशनसीब ,का कंधा।

वो समझते हैं ,मैं बहुत मजबूत हूं,,
पर मैं ढूंढता ,रहता हूं,
मेरी मां का कंधा।

नां जाने ,क्या खाती है,
हर किसी की मां।
कभी नही थकता ,किसी मां का कंधा।,

ऐ ख़ुदा है कसम ,तुझे तेरी मां की,
नां छिनना ,किसी से कभी,
उसकी ,मां का कंधा।
है तूं सच में ,अगर खुदा,
लौटा दे ,ख़ैरात में मुझे,
मेरी मां का कंधा।
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नव वर्ष

Written by D.K.Vasal- वासल देवेन्द्र
(नव वर्ष )
आयो नया वर्ष मनायें,
उठो जागो, हुआ नया सवेरा,
उगा सूरज, अब मिटा अंधेरा।
पक्षियों ने फिर, डेरा डाला,
फिर किरणों, ने आंचल पसारा।

मिल कर मंगल, गीत गाएं,
अपने ईश्वर को, फिर से रिझ़ाये।
चुनें फिर फ़ूल, फिर माला बनाएं,
अपने प्रभु के, चरणों में चढ़ाएं।

खोलें मन्दिर, खोलें गिरिजाघर,
मस्जिदों से, अज़ान सुने।
गुरुद्वारों से, लंगर खांये,
मन्दिरों में, शंखनाद करें,
गिरिजाघरों में, घंटियां बजायें,
मस्जिदों में, नमाज पढ़ें,
गुरुद्वारों से, बानी सुन आयें।

पक्षियों को, फिर दाना डालें,
सूर्य को, फिर जल चढ़ाएं।
कहे वासल देवेन्द्र अब ये,
भूल जायें, उस काले वर्ष को।
चलो मिलकर, फिर दिया जलाएं,

सब मिल, मंगल गीत गायें,
रुठे प्रभु को, फिर से मनाएं।
खुद हंसे, औरौं को हंसांये,
आयो हम, नया वर्ष मनायें।

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मैं वही हूं वही हूं वही

Written by D.k. Vasal -वासल देवेन्द्र
( मैं वही हूं, वही हूं, वही )

मैं कौन हूं ?
रिश्ता नाम ,कोई भी हो,

मैं वही हूं, वही हूं, वही।
किसी का पुत्र ,और पिता किसी का।
किसी का मित्र ,और भाई किसी का,
तुम पुकारो मुझे ,किसी रिश्ते यां नाम से,

मैं वही हूं, वही हूं, वही।

तुम दो गाली ,पिता को, पुत्र को,
मित्र को ,यां भाई को।
पर मत ,भूलो,

मैं वही हूं वही हूं वही।

कोई देता है गाली ,गौतम को,
है कोसता कोई ,कृष्ण को।
कोई देता दोष ,मोहम्मद को,
है कहता बुरा ,कोई ईसा को।
क्यों भूल जाता ,ये मूर्ख इन्सान?
मैं वही,वही हूं, वही हूं।

कोसते हो ,दिन रात मुझे,
मेरे ही नाम से,
पुछते हो फिर ,मैं नाराज़ क्यों हूं।
ज़रा सोचो……
गौतम को दी गाली ,भी मोहम्मद को लगती है,
ईसा की फांसी भी ,कृष्ण को लगती है।

कहता है वासल देवेन्द्र ये
ऐ मूर्ख इन्सान। ,जाग ज़रा,
क्यों श्राप ,खुद को देता है।
किस भ्रम में ,तू जीता है,
मैं तेरे भीतर ,रहता हूं,
रिश्ता नाम कोई ,भी हो,
मैं वही हूं, वही हूं, वही हूं।
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चोर चोर चोर

Written by D.K. Vasal…वासल देवेन्द्र

चोर चोर चोर

चोर चोर चोर , सभी ओर था शोर,
बच्चे बूढे ,और जवान।
सभी मचायें ,शोर,
किसको ,अच्छा लगता है।
सोचो ,शब्द ये चोर।

मैंने भी देखा ,सपने में,
बार बार ,इक चोर।
उठ जाऊं ,घबरा कर,
नां देखूं ,अगर वो चोर।

रोज़ रहता है ,सपनों में,
ना आये ,जब तक भोर।
मैं नादान ,नही जानता,
है ये ,कैसा चोर।
करता है ,मन मेरे को,
भोर भोर ,अति भोर।

सोचा ,इक दिन ,
जाग कर ,देखूं।
है छिपा ,कहां ये चोर,
गुज़र गयी ,पूरी रात मेरी।
दिखा नही , मुझे चोर।
जैसे लगी ,आंख फिर मेरी,
आ गया ,फिर वो चोर।

मैं नादान ,समझ गया अब,
ये कैसा ,चल रहा दौर।
जाग कर भी ,जब सोया हूं,
नही दिखता ,मुझे ये चोर।

सो कर भी ,जब जागा हूं,
रहे हर दम ,साथ ये चोर।
मैं नादान ,नही जानता,
है कौन ,तुम्हारा चोर।
क्या चुराया ,तुम्हारा उसने,
क्यों करते ,हो शोर।

वासल देवेन्द्र ,ने तो जान लिया,
कौन है ,उसका चोर।
रहें प्रबल ,जब इन्द्रियां,
मचाता है ,वो शोर।
रहो जागते ,सो कर भी,
मिलेगा ,माखन चोर।

रहो जागते ,जगायो औरौं को,
तुम मत ,मचाओ शोर।
मन मोहने ,को आया है,
सपनों में ,माखन चोर।
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मर्ज़ी का ख़ुदा

WRITTEN BY D.K VASAL–वासल देवेन्द्र
मर्ज़ी का ख़ुदा

हम ढूंढते हैं ,खुदा ऐसा,
जो करे वैसा ,हम चाहें जैसा।
ना करे कबूल ,दुआ जो,
वो ख़ुदा ,बदल देते।
ना माने ,फिर भी जो,
तो ख़ुदा ही ,भुला देते।

चाहते हैं ,करे हर कोई ,
दुआ हमारी ,अपने खुदा को।
पर मानते , नहीं फिर भी,
हम उसके ,खुदा को ।

लेते हैं ,इम्तिहान बहुत,
हम हर ,किसी खुदा के।
सोचता है ,वासल देवेन्द्र,
हों जैसे ,हम ख़ुद।
ख़ुदा उस ,ख़ुदा के।

रहते हैं ,डरे हरदम,
कुछ खोने ,के डर से।
रखते हैं ,चौकीदार हम,
अपने ,सामान के।

नही रखा ,खुदा ने,
चौकीदार ,कोई।
इतने बड़े ,जहां में,
सिकन्दर ,भी ना।
ले जा सका ,कुछ उसके जहां से।

रोता है इन्सान ,होने पर बर्बाद,
रोता है आंसू ,खून के।
निकले जो ,औलाद खराब,
ऱोता कितना ,होगा खुदा,
देख, हम ,जैसी औलाद।

सोचता होगा ,हर पल,
कहां हुई भूल ,बनाने में इन्सान।
ना दया ना धर्म ,ना रहम कोई,
न करनी पर ,अपनी पश्चाताप कोई।
करता है जमा ,बहुत,
भर के ,पेट अपना।
नही लेता ,पशु से भी,
नसीहत ,कोई।

मांगता है ,खुदा से,
खोल कर ,दोनों हाथ।
बांटता है ,ज़रा सा,
करके ,छोटा हाथ।

मिल जाए ,अग़र जो चाहा,
तो करें मेहनत ,पर अभिमान।
और ना मिले , अग़र,
तो निर्दयी ,बड़ा भगवान।

करे अगर ,कोई गलती,
हैं सज़ा ,हम देते।
कंजूस हैं ,हम इतने,
नही माफी ,भी हम देते।

हो गलती ,अगर हमारी,
दोष दूसरे ,को देते।
ना सुने ,अगर खुदा
तो खुदा ,ही बदल देते।

हर रोज़ ,नया ख़ुदा,
हैं ढूंढते ,हम रहते।
करे जो ऐसा ,हम चाहें जैसा,
ना करे कबूल ,दुआ जो।
वो ख़ुदा ,बदल देते,
ना माने ,फिर भी जो
तो ख़ुदा ही ,भुला देते।

******

नमक

Written by D. K. Vasal – वासल देवेन्द्र
( नमक )
मेरे होने की, ,कोई सराहना नही करता,
मेरा ना होना ,कोई बर्दाश्त नही करता।
मेरा ज़रा भी ,ज़्यादा होना,
बहुत अखरता है।
मेरा ना होना ,कोई सहन नही करता,

शायद मैं ,भूल रहा हूं,
सिर्फ रंग सफेद ,होने से
कुछ नही ,होता है।
मैं नमक हूं, ,मिठास नही,
नही तो ,क्यों।
सब के गुस्से ,का शिकार होता।

हूं ज़रुरी मैं बहुत ,ये सब जानते हैं,
शुभ काम में मुझे ,कोई याद नही करता।
हैं यही विडम्बना ,इस संसार की,
जो देता है सुख ,उसे नहीं पूछता,
और मीठे ज़हर को ,वो रहे ढूंढता।

वक्त कैसा भी हो ,मैं साथ नही छोड़ता,
पियो गम में यां ,खुशी में।
देता हूं ,हमेशां साथ,
नही देखा कभी ,किसी को,
लेते मय ,मीठे के साथ।

हां समझा ,वासल देवेन्द्र,
सिर्फ इंसान का ,ही नही।
हर ‘श’ का ,नसीब होता है।
चिराग जो देता है, ,अंधेरे में साथ,
बुझाने में उसको ,बस सुबह का।
इंतजार होता है।
जो देता है ,हमेशां साथ,
वो ही गुस्से का ,शिकार होता है।

सिर्फ रंग ,सफेद होने से,
कुछ नही होता।
ये तो अपना अपना ,नसीब होता है,
मेरे होने की कोई ,सराहना नही करता,
मेरा ना होना ,कोई बर्दाश्त नही करता।

***

पानी

Written by D. K. Vasal — वासल देवेन्द्र
(पानी)

हिंदी में जल, संस्कृत में पानी,
है मेरा प्रणाम उसको।
रखा जिसने पानी का,
नाम पानी।
पा से पावन ,नी से नीरद ,( जल देने वाला मेघ )
है बिना गंध पारदर्शी पानी।

रखता नही कोई रंग पानी,
क्या सच में है बेरंग पानी।
मैं नही मानता ये कहानी,
पूछो देशभक्तों से,
क्या होता है काला पानी।

हंसता है वासल देवेन्द्र,
देख इन्सानों की नाकामी,
करनी थी सराहना देश भक्तों की।
कर दिया बदनाम पानी।

ना जाने किसने भ्रम फैलाया,
मछली जल की है रानी।
भोली भाली नाज़ुक है वो,
ज़रूरत है, उसकी पानी।

बचपन से सुनता आया हूं,
जीवन है उसका पानी।
बस मछली को बदनाम कीया,
हर जीव की जान,
है पानी।

सूख जाती है धरती सारी,
जो ना बरसे बरसात का पानी।
बह जाते हैं गांव सारे,
अगर ज़ोर से बरसे पानी।

रखना है खुद को जिंदा तो
चाहिए हम सब को पानी,
रखनी है लाज अपनी तो,
फिर चाहिए सोने का पानी।

मर जाते हैं रिश्ते भी,
मर जाये अगर आंख का पानी।
कहां बांटा दर्द किसी का,
जो ना आया आंख में पानी।

बिना “प” संगीत नही,
” नी” स्वरों की है रानी।
पाणिग्रहण से शुरू होती है,
हर गृहस्थी की कहानी।

अंतिम स्वर भी ये पुकारें
है कहां गंगा का पानी,
अस्थियों की भी है पुकार
हो गंगा- यमुना का पानी।

जन्म से लेकर मृत्यु तक,
है ज़रुरी हम को सब को पानी।
चलो खांये कसम , सब मिल कर,
रखेंगे ,…बचा कर पानी।
बचना है अगर होने से,
भविष्य में पानी-पानी।

***

धुंध

Written by D K Vasal – देवेन्द्र वासल
( धुंध )
दिखती है धुंध ,हर तरफ,
हैं धुंआ ही धुआं ,हर तरफ।
हैं मौसम की शरारत,
इन्सान की बेगैरत,
यां सिर्फ नज़र का धोखा।
देखा है मैंने इन्सान वो,
था जो इन्सान की तरहां।
अब रहता है छिपा पर्दों में,
यां मद के आगोश में,
नही दिखता वासल देवेन्द्र को अब,
इन्सान कोई होश में।

हर चेहरा है धुंधला और पीला,
दबा ना जाने किस बोझ में।
रहता है हर दम घिरा,
अधजले रिश्तों के धुंए में।

ढूंढता है सुकून ऐसे,
सुई घास के ढेर में जैसे।
वो बदल गया, इतना कब कैसे
उसे खुद पता नहीं चला।

उम्र से नही वो बोझ से दबता है,
हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरता है।
उसका तो अब आईना भी,
सच बोलने से डरता।

गुज़र गया जीवन सारा,
मकसद खोजने में मारा मारा।
हो ने लगा है यकीन उसको,
अब वो लौट जायेगा।
एक धुंध से आया था,
और धुंआ बन जायेगा।

****

अक्षर ढाई

Written by D.k.Vasal-वासल देवेन्द्र
( अक्षर ढाई ) Original Author.

ज्ञान मार्ग जब ,खोजने निकला,
मार्ग मिला ,अलबेला।
जहां भी जाऊं ,जिधर भी देखूं,
मिले ढाई अक्षर , का मेला।

सोचा इक पल ,ध्यान लगा कर
क्या होता है ,अक्षर ढाई

जो आया समझ में,

वासल देवेन्द्र के ( Original Author)

बतलाता हूं ,मैं वो भाई
रह जाता सब ,ज्ञान अधूरा
जो ना मिलता ,उत्तर भाई।

ढाई अक्षर का वक्र,
और ढाई अक्षर का तुंड।
ढाई अक्षर की रिद्धि,
और ढाई अक्षर की सिद्धि।
ढाई अक्षर का शंभु,
और ढाई अक्षर की सत्ति

ढाई अक्षर का ब्रम्हा
और ढाई अक्षर की सृष्टि।
ढाई अक्षर का विष्णु
और ढाई अक्षर की लक्ष्मी
ढाई अक्षर का कृष्ण
और ढाई अक्षर की कांता।(राधा रानी का दूसरा नाम)

ढाई अक्षर की दुर्गा
और ढाई अक्षर की शक्ति
ढाई अक्षर की श्रद्धा
और ढाई अक्षर की भक्ति
ढाई अक्षर का त्याग
और ढाई अक्षर का ध्यान।

ढाई अक्षर की तृप्ति
और ढाई अक्षर की तृष्णा।
ढाई अक्षर का धर्म
और ढाई अक्षर का कर्म
ढाई अक्षर का भाग्य
और ढाई अक्षर की व्यथा।

ढाई अक्षर का ग्रन्थ,
और ढाई अक्षर का संत।
ढाई अक्षर का शब्द
और ढाई अक्षर का अर्थ।
ढाई अक्षर का सत्य
और ढाई अक्षर का मिथ्या।

ढाई अक्षर की श्रुति
और ढाई अक्षर की ध्वनि।
ढाई अक्षर की अग्नि
और ढाई अक्षर का कुंड
ढाई अक्षर का मंत्र
और ढाई अक्षर का यंत्र।

ढाई अक्षर की सांस
और ढाई अक्षर के प्राण
ढाई अक्षर का जन्म
ढाई अक्षर की मृत्यु
ढाई अक्षर की अस्थि
और ढाई अक्षर की अर्थी

ढाई अक्षर का प्यार
और ढाई अक्षर का स्वार्थ।
ढाई अक्षर का मित्र
और ढाई अक्षर का शत्रु
ढाई अक्षर का प्रेम
और ढाई अक्षर की घृणा।

जन्म से लेकर मृत्यु तक
हम बंधे हैं ढाई अक्षर में।
हैं ढाई अक्षर ही वक़्त में,
और ढाई अक्षर ही अंत में।
समझ ना पाया वासल देवेन्द्र ,
है रहस्य क्या ढाई अक्षर में।

****

अभी जिंदा हूं मैं

Vasaldk.blogspot.com


हटाते हैं मेरा नाम जो        ,कविता से मेरी,
हैं जान बहुत                   ,अभी कलम में मेरी।
रहे उनको ये एहसास        ,अभी जिंदा हूं मैं।

फिर करो कोशिश              ,मुझे भुलाने की,
हो तुम को भी एहसास        ,अभी जिंदा हूं मैं।
थका दिया मैंने वक़्त को      ,पर थका नही,
हो वक़्त को भी एहसास      ,अभी जिंदा हूं मैं।

गैरों से ज़्यादा अपनों ने        ,दिया दर्द मुझे,
रहे अपनों को भी एहसास    ,अभी जिंदा हूं मैं।
मारी हैं ठोकरें बहुत             ,ज़माने ने मुझे,
रहे ज़माने को भी एहसास,   ,अभी जिंदा हूं मैं।

निभाया इश्क मैंने बेवफा      ,दिलरुबा के साथ,
रहे दिलरुबा को भी एहसास  ,अभी जिंदा हूं मैं।
इश्क कहां सब का               ,मोहब्बत बनता है,
रहे मोहब्बत को भी एहसास  ,अभी जिंदा हूं मैं।

तुम घूरते हो मुझे                ,निगाहें लाल से,
हैं निगाहें तुम्हारी लाल         ,सिर्फ रंग से।
है जिस्म में मेरे खून            ,लाल रंग का,
हो रंग को भी एहसास       ,अभी जिंदा हूं मैं।

तुम डराते हो मुझे             ,आंधी के झोंको से,
हैं तुफ़ान की गोद             ,घर मेरा।
रहे आंधी को भी एहसास  ,अभी जिंदा हूं मैं।

ना करो बेकार कोशिश      ,मुझे भुलाने की,
है ज़हन में तुम्हारे             ,एहसास मेरा।
है एहसास को भी एहसास  ,अभी जिंदा हूं मैं,

पुकार के देखो प्यार से       ,वासल देवेन्द्र को,
होगा प्यार को एहसास      ,अभी जिंदा हूं मैं।
देख सकता हूं तुमको        ,अब भी नज़र से अपनी,
रहे नज़र को भी एहसास   ,अभी जिंदा हूं मैं।

रहोगे जब तक तुम           ,साथ मेरे,
रहेगी मेरी                       ,सांस में सांस।
रहे सांस को ये एहसास    ,अभी जिंदा हूं मैं।

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