Written by D.K.Vasal….वासल देवेन्द्र
धीरे धीरे
है सृष्टि का संदेश चलो तुम धीरे धीरे,
चलती है धरती भी धीरे धीरे।
ढलता है सूरज भी धीरे धीरे,
टिमटिमाते हैं तारे भी धीरे धीरे।
होती है भोर भी धीरे धीरे।
धड़कता है दिल भी धीरे धीरे,
चलती हैं सांसें भी धीरे धीरे।
फिसलता है बचपन भी धीरे धीरे,
ढलती है जवानी भी धीरे धीरे,
घटती है उम्र भी धीरे धीरे।
प्यार भी होता है धीरे धीरे,
बहलता है मन भी धीरे-धीरे।
पलकें भी झपकती हैं धीरे धीरे,
बालक सोता है धीरे धीरे,
मां सुनाती है लोरी भी धीरे धीरे।
बदलती हैं ऋतुयें भी धीरे धीरे,
खिलते हैं पुष्प भी धीरे धीरे।
महकते हैं गुलशन भी धीरे धीरे,
पकते हैं फल भी धीरे-धीरे।
पचता है भोजन भी धीरे धीरे
चलता है वक्त भी धीरे धीरे,
आती है समझ भी धीरे धीरे।
कहता है वासल देवेन्द्र ये धीरे धीरे,
जप ले हरि नाम तूं धीरे धीरे।
वो सुनता है पुकार को धीरे धीरे,
मिलता है मोक्ष भी धीरे धीरे,
है सृष्टि का संदेश चलो तुम धीरे धीरे।
*****
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Published by Vasaldevenderpoetry
The Blogger D. K. Vasal ( Devender Kumar Vasal) is a renowned Lawyer.
He was a Head of legal for STANDARD CHARTERED BANK India & other territories.
General legal counsel for VEDANTA plc.
A Senior partner in DSKlegal , one of the largest law firms.
DK ( as populary known ) was a Chairman of ISSAGRO ASIA LTD.
DK is a board of director on many companies.
The Blogger वासल देवेन्द्र, vasaldk, DK Vasal, (DK) , is also a flautist. He learnt playing flute at the age of 60+ and now gives stage performances.
वासल देवेन्द्र is also a poet and writes poems both in English and Hindi and many of them have been published in Magzines. His recent poem अक्षर ढाई has become very popular.
At the age of 64 he ran 2 half marathons ( 21 KILOMETRES) one on October 4, 2020 (@ 6.33 and another on November 29, 2020.
He is converting whole of Bhagvad Gita into poetry.
The work is in progress and half of that has been completed.
Contact detail , blog: vasaldk.blogspot.com
Website : dkvasal.com
Email : vasaldevenderpoetry@gmail.com
Mobile: +919820347326
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बहुत सुन्दर प्रस्तुति है
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आपाधापी भरी ज़िंदगी में अटके हम जैसे मनुष्यों को प्रकृति के अनुकूल धैर्यवान बनने को प्रेरित करती एक प्रशंसनीय कविता जो हमें, संत कबीर के दोहे – “ धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय” की बरबस याद दिलाती है।
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This poem has a very soothing effect on our minds……..advising us not to be in a hurry all the time and also keep on reciting Hari naam.
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Brilliant Vasalji 🙏🌹
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Thank you Dear.
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In today’s life everyone seems to be in a rush. The poem has very beautifully explained that everything happens at its own pace and so why keep rushing.
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Thank you Mathur Sahab.
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