SOLDIERS –सैनिक

WRITTEN BY D K VASAL,
DEDICATED TO SOLDIERS.
SOLDIERS– सैनिक

वो सो गये कफ़न ओढ़ के,
हम सो गए मुंह मोड़ के,
थे लाडले वो भी, अपने परिवार के,
जो चले गये, सब छोड़ के।

वो बन बन के शव , हमें झंझोड़ते रहे,
हम शव हों जैसे, ऐसे सोते रहे।
देख सुबह अखबारों में, शहादत उनकी,
ले ले कर चुस्कियां, चाय पीते रहे।

पल दो पल में उनको भुलाते रहे,
अपने हर फर्ज़ को हम झुठलाते रहे।
उनकी शहादत को फर्ज़ बतलाते रहे,
उनके बलिदान को, इक खबर बनाते रहे।

ना मिट्टी को अपनी सराहा कभी,
ना वीरौं को अपने दुलारा कभी।
फुला करके सीना, झूठ कहते रहे,
है वतन ये हमारा, चिल्लाते रहे।

हर पल हम रंग बदलते रहे,
गिरगिट भी हमसे शर्माते रहे।
हम सुरक्षा से अपनी, धबराते रहे,
वो सीने पे गोली , खाते रहे।

वो शवों के ढेर, बनते गये,
हम ऊंचा घरों को, करते गये।
परिवार उनके सिसकियां भरते गये,
हम ठहाकों में, सब कुछ भुलाते गये।

क्या आती नही हमको लज्जा शर्म ???
अगर हां , तो वासल देवेन्द्र के संग।

मिलकर हम सब खाते हैं कसम,
मनाने से पहले, कोई भी त्योहार,
करेंगे नमन, उन शहीदों को हम।

है सबसे बड़ा, ये ही शगुन,
हो जाये आंख , हमारी भी नम।
इतना तो कर लें कम से कम,
पत्थर नहीं इन्सान है हम।
*****”

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बांसुरी

बांसुरी
WRITTEN BY D. K. VASAL
( बांसुरी )
इक टुकड़ा है बांस का,
हैं बस छेद ही छेद।
कहां समझ पाया कोई,
हर छेद में कितने भेद।

“स” लगाओ कहीं से,
कहीं से लगाओ “प”।
यकीनन राग बजेगा,
करो ना कोई संदेह।

इक टुकड़ा था बांस का,
था ना कोई नाम।
हरि ने उठाया हाथ में,
बांस हुआ हैरान।

करे छेद कुछ हरि ने,
दे दिया बांसुरी नाम।
हर सुर निकले हर छेद से,
दे दिया ये वरदान।

लगाया हरि ने जब होंठों से,
मां सरस्वती को हुआ ज्ञान।
आकर बैठी हर सुर में,
टूटा सब का ध्यान।

ॠषि , मुनि और हर ज्ञानी,
मनुष्य पक्षी और हर प्राणी।
सुनें सांस को रोक सब,
बांसुरी बोले हरि की बानी।

देख बांस की कहानी,
भर आया आंख में पानी।
सोचा वासल देवेन्द्र ने,
ये देह तो है आनी जानी।
बनाता अगर मुझे बांस तो,
क्या होती हरि की हानी।

लगता हरि के होंठों से
गाता हरि की बानी।
मैं मनुष्य होकर भी कुछ नही।
वो बांस होकर भी सब कुछ है

शायद इसी का नाम प्रारब्ध है
शायद यही हरि की इच्छा है।
है लीला ये सब हरि की
ये हरि की ही सब इच्छा है।

फिर आया विचार मेरे मन में,

हरि तो हैं कृष्ण भगवान,
बनाया नही मुझको बांस।
कुछ सोच बनाया मुझे इन्सान,
भेजा देकर बस ये ज्ञान।
लो हर सांस में उनका नाम,
है हरि से बड़ा हरि का नाम।
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मोक्ष

WRITTEN BY D. K. VASAL — वासल देवेन्द्र ( मोक्ष )
कहा किसी ने मुझसे,
कहो कवि कुछ ऐसा।
हो बात कल्याण की,
हो संदर्भ मोक्ष का।
अहो भाग्य मेरे,
नाम आया याद ,
फिर हरि का।

है मोक्ष नही ये प्रश्न सरल,
लगता है समय बतलाने में।
भगवान को भी लगा समय,
अर्जुन को समझाने में।

मैं हूं एक अदना सा कवि,
क्या लिखे मोक्ष पे ,कलम मेरी।
लिख पाऊं अगर दो शब्द भी,
होगी हरी की कृपा बड़ी।

आया जब तक ना समझ,
अर्जुन की व्याकुलता बड़ी।
है मोक्ष नही प्रश्न केवल,
है अदभुत रहस्य जीवन का।
गीता में ही है छिपा,
भेद इसके मिलने का।

“मो” से मोह, “क्ष” से नाश,
हो नाश मोह का,है अर्थ इसका।
बस इतना समझना है हमको,
हो कैसे नाश ,अब इस मोह का।
है यही सार बस यही सार,
है मोक्ष सार बस गीता का।

गीता नही कोई धर्म ग्रन्थ,
है उत्तम तरीका जीने का।
नही आता शब्द गीता में,
एक बार भी हिन्दू होने का।

करो ज्ञान योग यां, कर्म योग,
करो भक्ति योग, यां ध्यान योग।
तुम त्यागो ,सब का फल ओर भोग,
खुल जायेगा द्वार मोक्ष का।
है यही एक संदेश मात्र,
एक मात्र तरीका जीने का।

जब रूकेगा आत्मा का आवागमन,
तब होगा परमात्मा से मिलन।
हो जायेंगे एक दोनों हम,
मिट जायेगा तब, सारा भ्रम।

नही भटकेगी फिर आत्मा,
हो कर इतनी अधीर।
थम जायेगा सिलसिला,
मिलने का नया शरीर।

समझाता है ये योगशास्त्र ( गीता),
दोहराता है वासल देवेन्द्र।
ले लो अब ये सीख।
छोड़ा अगर परमात्मा,
तुमने जो एक बार।
मिलेगा तुम को गर्भ नया,
रह रह के बार बार।

छुटेगा फिर ना मोह तुम्हारा,
ना होगा मोह का नाश।
ना हरि मिलेगा फिर तुम्हें,
ना फिर मिलेगा मोक्ष।

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मां का कन्धा

Written by D K Vasal – वासल देवेन्द्र
( मां का कंधा )
आज बहुत याद ,आ रही है,
मुझे मेरी मां की।
यूं तो हरा भरा ,भरपूर है मेरा घर,
सिर्फ बच्चे ही नही ,हैं बच्चों के बच्चे भी मेरे घर।

नां जाने फिर ,भी क्यों,
लगता है मन ,खाली खाली सा।
बहुत खोजा ,हर रिश्ता खोदा,
पर ना मिला कोई ,मेरी माई सा।
कह नहीं सकता ,पर लगता है,
वासल देवेन्द्र को।
लगता होगा ऐसा ही ,हर किसी को।

सोचता हूं कभी ,कह दूं खुदा से,
रहे ना रहे कोई ,तेरे जहां में,
पर है रहना ज़रूरी ,हर मां का।

जब बच्चा था ,लगे चोट,
तो जा पकड़ता था ,मां का कंधा।
हुआ बड़ा ,दर्द बढ़ा,
तो भी था ,मां का कंधा,

अब परिवार में ,ढूंढता है,
हर कोई ,कोई न कोई कंधा।
और आ कर ,पकड़ता है,
मुझ खुशनसीब ,का कंधा।

वो समझते हैं ,मैं बहुत मजबूत हूं,,
पर मैं ढूंढता ,रहता हूं,
मेरी मां का कंधा।

नां जाने ,क्या खाती है,
हर किसी की मां।
कभी नही थकता ,किसी मां का कंधा।,

ऐ ख़ुदा है कसम ,तुझे तेरी मां की,
नां छिनना ,किसी से कभी,
उसकी ,मां का कंधा।
है तूं सच में ,अगर खुदा,
लौटा दे ,ख़ैरात में मुझे,
मेरी मां का कंधा।
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नव वर्ष

Written by D.K.Vasal- वासल देवेन्द्र
(नव वर्ष )
आयो नया वर्ष मनायें,
उठो जागो, हुआ नया सवेरा,
उगा सूरज, अब मिटा अंधेरा।
पक्षियों ने फिर, डेरा डाला,
फिर किरणों, ने आंचल पसारा।

मिल कर मंगल, गीत गाएं,
अपने ईश्वर को, फिर से रिझ़ाये।
चुनें फिर फ़ूल, फिर माला बनाएं,
अपने प्रभु के, चरणों में चढ़ाएं।

खोलें मन्दिर, खोलें गिरिजाघर,
मस्जिदों से, अज़ान सुने।
गुरुद्वारों से, लंगर खांये,
मन्दिरों में, शंखनाद करें,
गिरिजाघरों में, घंटियां बजायें,
मस्जिदों में, नमाज पढ़ें,
गुरुद्वारों से, बानी सुन आयें।

पक्षियों को, फिर दाना डालें,
सूर्य को, फिर जल चढ़ाएं।
कहे वासल देवेन्द्र अब ये,
भूल जायें, उस काले वर्ष को।
चलो मिलकर, फिर दिया जलाएं,

सब मिल, मंगल गीत गायें,
रुठे प्रभु को, फिर से मनाएं।
खुद हंसे, औरौं को हंसांये,
आयो हम, नया वर्ष मनायें।

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मैं वही हूं वही हूं वही

Written by D.k. Vasal -वासल देवेन्द्र
( मैं वही हूं, वही हूं, वही )

मैं कौन हूं ?
रिश्ता नाम ,कोई भी हो,

मैं वही हूं, वही हूं, वही।
किसी का पुत्र ,और पिता किसी का।
किसी का मित्र ,और भाई किसी का,
तुम पुकारो मुझे ,किसी रिश्ते यां नाम से,

मैं वही हूं, वही हूं, वही।

तुम दो गाली ,पिता को, पुत्र को,
मित्र को ,यां भाई को।
पर मत ,भूलो,

मैं वही हूं वही हूं वही।

कोई देता है गाली ,गौतम को,
है कोसता कोई ,कृष्ण को।
कोई देता दोष ,मोहम्मद को,
है कहता बुरा ,कोई ईसा को।
क्यों भूल जाता ,ये मूर्ख इन्सान?
मैं वही,वही हूं, वही हूं।

कोसते हो ,दिन रात मुझे,
मेरे ही नाम से,
पुछते हो फिर ,मैं नाराज़ क्यों हूं।
ज़रा सोचो……
गौतम को दी गाली ,भी मोहम्मद को लगती है,
ईसा की फांसी भी ,कृष्ण को लगती है।

कहता है वासल देवेन्द्र ये
ऐ मूर्ख इन्सान। ,जाग ज़रा,
क्यों श्राप ,खुद को देता है।
किस भ्रम में ,तू जीता है,
मैं तेरे भीतर ,रहता हूं,
रिश्ता नाम कोई ,भी हो,
मैं वही हूं, वही हूं, वही हूं।
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चोर चोर चोर

Written by D.K. Vasal…वासल देवेन्द्र

चोर चोर चोर

चोर चोर चोर , सभी ओर था शोर,
बच्चे बूढे ,और जवान।
सभी मचायें ,शोर,
किसको ,अच्छा लगता है।
सोचो ,शब्द ये चोर।

मैंने भी देखा ,सपने में,
बार बार ,इक चोर।
उठ जाऊं ,घबरा कर,
नां देखूं ,अगर वो चोर।

रोज़ रहता है ,सपनों में,
ना आये ,जब तक भोर।
मैं नादान ,नही जानता,
है ये ,कैसा चोर।
करता है ,मन मेरे को,
भोर भोर ,अति भोर।

सोचा ,इक दिन ,
जाग कर ,देखूं।
है छिपा ,कहां ये चोर,
गुज़र गयी ,पूरी रात मेरी।
दिखा नही , मुझे चोर।
जैसे लगी ,आंख फिर मेरी,
आ गया ,फिर वो चोर।

मैं नादान ,समझ गया अब,
ये कैसा ,चल रहा दौर।
जाग कर भी ,जब सोया हूं,
नही दिखता ,मुझे ये चोर।

सो कर भी ,जब जागा हूं,
रहे हर दम ,साथ ये चोर।
मैं नादान ,नही जानता,
है कौन ,तुम्हारा चोर।
क्या चुराया ,तुम्हारा उसने,
क्यों करते ,हो शोर।

वासल देवेन्द्र ,ने तो जान लिया,
कौन है ,उसका चोर।
रहें प्रबल ,जब इन्द्रियां,
मचाता है ,वो शोर।
रहो जागते ,सो कर भी,
मिलेगा ,माखन चोर।

रहो जागते ,जगायो औरौं को,
तुम मत ,मचाओ शोर।
मन मोहने ,को आया है,
सपनों में ,माखन चोर।
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मर्ज़ी का ख़ुदा

WRITTEN BY D.K VASAL–वासल देवेन्द्र
मर्ज़ी का ख़ुदा

हम ढूंढते हैं ,खुदा ऐसा,
जो करे वैसा ,हम चाहें जैसा।
ना करे कबूल ,दुआ जो,
वो ख़ुदा ,बदल देते।
ना माने ,फिर भी जो,
तो ख़ुदा ही ,भुला देते।

चाहते हैं ,करे हर कोई ,
दुआ हमारी ,अपने खुदा को।
पर मानते , नहीं फिर भी,
हम उसके ,खुदा को ।

लेते हैं ,इम्तिहान बहुत,
हम हर ,किसी खुदा के।
सोचता है ,वासल देवेन्द्र,
हों जैसे ,हम ख़ुद।
ख़ुदा उस ,ख़ुदा के।

रहते हैं ,डरे हरदम,
कुछ खोने ,के डर से।
रखते हैं ,चौकीदार हम,
अपने ,सामान के।

नही रखा ,खुदा ने,
चौकीदार ,कोई।
इतने बड़े ,जहां में,
सिकन्दर ,भी ना।
ले जा सका ,कुछ उसके जहां से।

रोता है इन्सान ,होने पर बर्बाद,
रोता है आंसू ,खून के।
निकले जो ,औलाद खराब,
ऱोता कितना ,होगा खुदा,
देख, हम ,जैसी औलाद।

सोचता होगा ,हर पल,
कहां हुई भूल ,बनाने में इन्सान।
ना दया ना धर्म ,ना रहम कोई,
न करनी पर ,अपनी पश्चाताप कोई।
करता है जमा ,बहुत,
भर के ,पेट अपना।
नही लेता ,पशु से भी,
नसीहत ,कोई।

मांगता है ,खुदा से,
खोल कर ,दोनों हाथ।
बांटता है ,ज़रा सा,
करके ,छोटा हाथ।

मिल जाए ,अग़र जो चाहा,
तो करें मेहनत ,पर अभिमान।
और ना मिले , अग़र,
तो निर्दयी ,बड़ा भगवान।

करे अगर ,कोई गलती,
हैं सज़ा ,हम देते।
कंजूस हैं ,हम इतने,
नही माफी ,भी हम देते।

हो गलती ,अगर हमारी,
दोष दूसरे ,को देते।
ना सुने ,अगर खुदा
तो खुदा ,ही बदल देते।

हर रोज़ ,नया ख़ुदा,
हैं ढूंढते ,हम रहते।
करे जो ऐसा ,हम चाहें जैसा,
ना करे कबूल ,दुआ जो।
वो ख़ुदा ,बदल देते,
ना माने ,फिर भी जो
तो ख़ुदा ही ,भुला देते।

******

नमक

Written by D. K. Vasal – वासल देवेन्द्र
( नमक )
मेरे होने की, ,कोई सराहना नही करता,
मेरा ना होना ,कोई बर्दाश्त नही करता।
मेरा ज़रा भी ,ज़्यादा होना,
बहुत अखरता है।
मेरा ना होना ,कोई सहन नही करता,

शायद मैं ,भूल रहा हूं,
सिर्फ रंग सफेद ,होने से
कुछ नही ,होता है।
मैं नमक हूं, ,मिठास नही,
नही तो ,क्यों।
सब के गुस्से ,का शिकार होता।

हूं ज़रुरी मैं बहुत ,ये सब जानते हैं,
शुभ काम में मुझे ,कोई याद नही करता।
हैं यही विडम्बना ,इस संसार की,
जो देता है सुख ,उसे नहीं पूछता,
और मीठे ज़हर को ,वो रहे ढूंढता।

वक्त कैसा भी हो ,मैं साथ नही छोड़ता,
पियो गम में यां ,खुशी में।
देता हूं ,हमेशां साथ,
नही देखा कभी ,किसी को,
लेते मय ,मीठे के साथ।

हां समझा ,वासल देवेन्द्र,
सिर्फ इंसान का ,ही नही।
हर ‘श’ का ,नसीब होता है।
चिराग जो देता है, ,अंधेरे में साथ,
बुझाने में उसको ,बस सुबह का।
इंतजार होता है।
जो देता है ,हमेशां साथ,
वो ही गुस्से का ,शिकार होता है।

सिर्फ रंग ,सफेद होने से,
कुछ नही होता।
ये तो अपना अपना ,नसीब होता है,
मेरे होने की कोई ,सराहना नही करता,
मेरा ना होना ,कोई बर्दाश्त नही करता।

***

पानी

Written by D. K. Vasal — वासल देवेन्द्र
(पानी)

हिंदी में जल, संस्कृत में पानी,
है मेरा प्रणाम उसको।
रखा जिसने पानी का,
नाम पानी।
पा से पावन ,नी से नीरद ,( जल देने वाला मेघ )
है बिना गंध पारदर्शी पानी।

रखता नही कोई रंग पानी,
क्या सच में है बेरंग पानी।
मैं नही मानता ये कहानी,
पूछो देशभक्तों से,
क्या होता है काला पानी।

हंसता है वासल देवेन्द्र,
देख इन्सानों की नाकामी,
करनी थी सराहना देश भक्तों की।
कर दिया बदनाम पानी।

ना जाने किसने भ्रम फैलाया,
मछली जल की है रानी।
भोली भाली नाज़ुक है वो,
ज़रूरत है, उसकी पानी।

बचपन से सुनता आया हूं,
जीवन है उसका पानी।
बस मछली को बदनाम कीया,
हर जीव की जान,
है पानी।

सूख जाती है धरती सारी,
जो ना बरसे बरसात का पानी।
बह जाते हैं गांव सारे,
अगर ज़ोर से बरसे पानी।

रखना है खुद को जिंदा तो
चाहिए हम सब को पानी,
रखनी है लाज अपनी तो,
फिर चाहिए सोने का पानी।

मर जाते हैं रिश्ते भी,
मर जाये अगर आंख का पानी।
कहां बांटा दर्द किसी का,
जो ना आया आंख में पानी।

बिना “प” संगीत नही,
” नी” स्वरों की है रानी।
पाणिग्रहण से शुरू होती है,
हर गृहस्थी की कहानी।

अंतिम स्वर भी ये पुकारें
है कहां गंगा का पानी,
अस्थियों की भी है पुकार
हो गंगा- यमुना का पानी।

जन्म से लेकर मृत्यु तक,
है ज़रुरी हम को सब को पानी।
चलो खांये कसम , सब मिल कर,
रखेंगे ,…बचा कर पानी।
बचना है अगर होने से,
भविष्य में पानी-पानी।

***

धुंध

Written by D K Vasal – देवेन्द्र वासल
( धुंध )
दिखती है धुंध ,हर तरफ,
हैं धुंआ ही धुआं ,हर तरफ।
हैं मौसम की शरारत,
इन्सान की बेगैरत,
यां सिर्फ नज़र का धोखा।
देखा है मैंने इन्सान वो,
था जो इन्सान की तरहां।
अब रहता है छिपा पर्दों में,
यां मद के आगोश में,
नही दिखता वासल देवेन्द्र को अब,
इन्सान कोई होश में।

हर चेहरा है धुंधला और पीला,
दबा ना जाने किस बोझ में।
रहता है हर दम घिरा,
अधजले रिश्तों के धुंए में।

ढूंढता है सुकून ऐसे,
सुई घास के ढेर में जैसे।
वो बदल गया, इतना कब कैसे
उसे खुद पता नहीं चला।

उम्र से नही वो बोझ से दबता है,
हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरता है।
उसका तो अब आईना भी,
सच बोलने से डरता।

गुज़र गया जीवन सारा,
मकसद खोजने में मारा मारा।
हो ने लगा है यकीन उसको,
अब वो लौट जायेगा।
एक धुंध से आया था,
और धुंआ बन जायेगा।

****

अक्षर ढाई

Written by D.k.Vasal-वासल देवेन्द्र
( अक्षर ढाई ) Original Author.

ज्ञान मार्ग जब ,खोजने निकला,
मार्ग मिला ,अलबेला।
जहां भी जाऊं ,जिधर भी देखूं,
मिले ढाई अक्षर , का मेला।

सोचा इक पल ,ध्यान लगा कर
क्या होता है ,अक्षर ढाई

जो आया समझ में,

वासल देवेन्द्र के ( Original Author)

बतलाता हूं ,मैं वो भाई
रह जाता सब ,ज्ञान अधूरा
जो ना मिलता ,उत्तर भाई।

ढाई अक्षर का वक्र,
और ढाई अक्षर का तुंड।
ढाई अक्षर की रिद्धि,
और ढाई अक्षर की सिद्धि।
ढाई अक्षर का शंभु,
और ढाई अक्षर की सत्ति

ढाई अक्षर का ब्रम्हा
और ढाई अक्षर की सृष्टि।
ढाई अक्षर का विष्णु
और ढाई अक्षर की लक्ष्मी
ढाई अक्षर का कृष्ण
और ढाई अक्षर की कांता।(राधा रानी का दूसरा नाम)

ढाई अक्षर की दुर्गा
और ढाई अक्षर की शक्ति
ढाई अक्षर की श्रद्धा
और ढाई अक्षर की भक्ति
ढाई अक्षर का त्याग
और ढाई अक्षर का ध्यान।

ढाई अक्षर की तृप्ति
और ढाई अक्षर की तृष्णा।
ढाई अक्षर का धर्म
और ढाई अक्षर का कर्म
ढाई अक्षर का भाग्य
और ढाई अक्षर की व्यथा।

ढाई अक्षर का ग्रन्थ,
और ढाई अक्षर का संत।
ढाई अक्षर का शब्द
और ढाई अक्षर का अर्थ।
ढाई अक्षर का सत्य
और ढाई अक्षर का मिथ्या।

ढाई अक्षर की श्रुति
और ढाई अक्षर की ध्वनि।
ढाई अक्षर की अग्नि
और ढाई अक्षर का कुंड
ढाई अक्षर का मंत्र
और ढाई अक्षर का यंत्र।

ढाई अक्षर की सांस
और ढाई अक्षर के प्राण
ढाई अक्षर का जन्म
ढाई अक्षर की मृत्यु
ढाई अक्षर की अस्थि
और ढाई अक्षर की अर्थी

ढाई अक्षर का प्यार
और ढाई अक्षर का स्वार्थ।
ढाई अक्षर का मित्र
और ढाई अक्षर का शत्रु
ढाई अक्षर का प्रेम
और ढाई अक्षर की घृणा।

जन्म से लेकर मृत्यु तक
हम बंधे हैं ढाई अक्षर में।
हैं ढाई अक्षर ही वक़्त में,
और ढाई अक्षर ही अंत में।
समझ ना पाया वासल देवेन्द्र ,
है रहस्य क्या ढाई अक्षर में।

****

अभी जिंदा हूं मैं

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हटाते हैं मेरा नाम जो        ,कविता से मेरी,
हैं जान बहुत                   ,अभी कलम में मेरी।
रहे उनको ये एहसास        ,अभी जिंदा हूं मैं।

फिर करो कोशिश              ,मुझे भुलाने की,
हो तुम को भी एहसास        ,अभी जिंदा हूं मैं।
थका दिया मैंने वक़्त को      ,पर थका नही,
हो वक़्त को भी एहसास      ,अभी जिंदा हूं मैं।

गैरों से ज़्यादा अपनों ने        ,दिया दर्द मुझे,
रहे अपनों को भी एहसास    ,अभी जिंदा हूं मैं।
मारी हैं ठोकरें बहुत             ,ज़माने ने मुझे,
रहे ज़माने को भी एहसास,   ,अभी जिंदा हूं मैं।

निभाया इश्क मैंने बेवफा      ,दिलरुबा के साथ,
रहे दिलरुबा को भी एहसास  ,अभी जिंदा हूं मैं।
इश्क कहां सब का               ,मोहब्बत बनता है,
रहे मोहब्बत को भी एहसास  ,अभी जिंदा हूं मैं।

तुम घूरते हो मुझे                ,निगाहें लाल से,
हैं निगाहें तुम्हारी लाल         ,सिर्फ रंग से।
है जिस्म में मेरे खून            ,लाल रंग का,
हो रंग को भी एहसास       ,अभी जिंदा हूं मैं।

तुम डराते हो मुझे             ,आंधी के झोंको से,
हैं तुफ़ान की गोद             ,घर मेरा।
रहे आंधी को भी एहसास  ,अभी जिंदा हूं मैं।

ना करो बेकार कोशिश      ,मुझे भुलाने की,
है ज़हन में तुम्हारे             ,एहसास मेरा।
है एहसास को भी एहसास  ,अभी जिंदा हूं मैं,

पुकार के देखो प्यार से       ,वासल देवेन्द्र को,
होगा प्यार को एहसास      ,अभी जिंदा हूं मैं।
देख सकता हूं तुमको        ,अब भी नज़र से अपनी,
रहे नज़र को भी एहसास   ,अभी जिंदा हूं मैं।

रहोगे जब तक तुम           ,साथ मेरे,
रहेगी मेरी                       ,सांस में सांस।
रहे सांस को ये एहसास    ,अभी जिंदा हूं मैं।

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